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Monday, January 25, 2010

इस जनतंत्र में आम आदमी

गणतंत्र दिवस के बारे में सोचते हुए कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की पंक्तियाँ याद आती हैं। उन्होंने लिखा था-


‘क्या आज़ादी तीन थके हुए रंगों का नाम है
जिन्हें एक पहिया ढोता है
या इसका कोई ख़ास मतलब होता है’

क्या आज भी धूमिल की पंक्तियाँ प्रासंगिक नहीं लगती हैं ? स्व.दुष्यंत कुमार भी कह गए हैं-
कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए उ.प्र. के गोण्डा ज़िले के किसान शायर रामनाथ सिंह उर्फ़ अदम गोण्डवी ने लिखा-


सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है
दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है

मुम्बई के विश्वस्तर के सीलिंक पर हम गर्व कर सकते हैं मगर महाराष्ट्र के किसानों की दशा किसी से भी छुपी नहीं है । बरसों पहले एक शायर नवाज़ देवबंदी ने अपने एक शेर में यह सच बयान कर दिया था-

भूखे बच्चों की तसल्ली के लिए
माँ ने फिर पानी पकाया देर
अब आप ही बताएं कि कैसे गीत लिखकर हम आज़ादी का जश्न मनाएं ! मेरी सोच के कैनवास पर विचारों ने जो अक्स बनाए उसे ही तीन गीतों के माध्यम से आप तक पहुँचा रहा हूँ ।

जनतंत्र में आम आदमी (1)


हर दिन सूरज उम्मीदों का नया सवेरा लाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है

बरसों बीते फिर भी बस्ती अँधकार में डूबी है
कभी-कभी लगता है जैसे यह आज़ादी झूठी है
आँखों का हर ख़्वाब अचानक अश्कों में ढल जाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है

हाथ बँधे है अब नेकी के सच के मुँह पर ताला है
मक्कारों का डंका बजता चारों तरफ़ घोटाला है
खरा दुखी है खोटा लेकिन हर सिक्का चल जाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है

देश की ख़ुशहाली में शामिल आख़िर ख़ून सभी का है
मगर है लाठी हाथ में जिसके हर क़ानून उसी का है
वही करें मंजूर सभी जो ताक़तवर फरमाता है
हर आँगन में दीप ख़ुशी का मगर कहाँ जल पाता है

जनतंत्र में आम आदमी (2)
रोज़ सुबह उगता है सूरज शाम ढले छुप जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है

दर-दर ठोकर खाए जवानी कोई काम नहीं मिलता
आज भी मेहनत-मज़दूरी का पूरा दाम नहीं मिलता
कौन हवस का मारा है जो हक़ सबका खा जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है

क्या बतलाएं स्वप्न सुहाने जैसे कोई लूट गया
मँहगाई के बोझ से दबकर हर इक इन्सां टूट गया
रोज़ ग़रीबी-बदहाली का साया बढ़ता जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है

किसे पता कब देश में अपने ऐसा भी दिन आएगा
काम मिलेगा जब हाथों को हर चेहरा मुस्काएगा
आज तो ये आलम है बचपन भूखा ही सो जाता है
हर इक घर में चूल्हा लेकिन रोज़ कहाँ जल पाता है

जनतंत्र में आम आदमी (3)
दुनिया बदली मगर अभी तक बैठे हैं अँधियारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में

हर ऊँची दहलीज़ के भीतर छुपा हुआ है धन काला
घूम रहे बेख़ौफ़ सभी वो करते हैं जो घोटाला
कर्णधार समझे हम जिनको शामिल हैं बटमारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में

जो सच्चे हैं वो चुनाव में टिकट तलक न पाते हैं
मगर इलेक्शन जीत के झूठे मंत्री तक बन जाते हैं
जिन पर हमको नाज़ था वो भी खड़े हुए लाचारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में

जिनके मन काले हैं उनके तन पर है उजली खादी
भ्रष्टाचार में डूब गए जो बोल रहे हैं जय गाँधी
ऐसे ही चेहरे दिखते हैं रोज सुबह अख़बारों में
जाने कब सूरज आएगा बस्ती के गलियारों में


देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 

 

Sunday, January 24, 2010

शाम हुई दारू पिए लौटे नंदकिशोर

मुम्बई में ‘परिवार’ नाम की संस्था ने पिछले बीस सालों से हिंदी के प्रमुख रचनाकारों को पुरस्कृत करने के साथ-साथ हिंदी काव्य मंच की गरिमा को बरकरार रखने का भी सराहनीय काम किया है । मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं ख़ुद भी पिछले 18 सालों से इस संस्था से जुड़ा हूँ । अब तक परिवार पुरस्कार से बाबा नागार्जुन, कवि प्रदीप, शरद जोशी, गोपालदास नीरज, भारत भूषण, हरीश भदानी, नईम, सोम ठाकुर, माहेश्वर तिवारी, कन्हैयालाल नंदन, सूर्यभानु गुप्त, कैलाश गौतम, कुँअर बेचैन और बुद्धिनाथ मिश्र जैसे रचनाकारों को सम्मानित किया जा चुका है । पूर्व प्रधानमंत्री वी.पी.सिंह, शायर मजरूह सुलतानपुरी, गुलज़ार और जावेद अख़्तर जैसी हस्तियाँ अपने काव्यपाठ से परिवार के मंच को गरिमा प्रदान कर चुकी हैं । इसके लिए संस्थाध्यक्ष रामस्वरूप गाड़िया बधाई के पात्र हैं ।

परिवार काव्य उत्सव में हस्तीमल हस्ती, आसकरण अटल, निदा फ़ाज़ली, शचीन्द्र त्रिपाठी, विश्वनाथ सचदेव, नंदकिशोर नौटियाल, पं.राम नारायण, प्रो.नंदलाल पाठ, रामस्वरूप गाड़िया और महक भारती
रविवार को मुम्बई के बिरला मातुश्री सभागार में आयोजित एक भव्य समारोह में वरिष्ठ साहित्यकार प्रो.नंदलाल पाठक को परिवार पुरस्कार से सम्मानित किया गया । विश्वविख्यात सारंगीवादक पद्मश्री पं. रामनारायण ने 51 हज़ार रूपए का यह पुरस्कार उन्हें प्रदान किया । परिवार के आयोजन में श्रोता भी बहुत अच्छे-अच्छे आते हैं । इस बार भी मुम्बई के दो प्रमुख घरानों का नेतृत्व करने करने वाली दो प्रमुख हस्तियाँ श्रीमती राजश्री बिरला और श्रीमती किरण बजाज श्रोताओं में मौजूद थीं । काव्य उत्सव में महक भारती (पटियाला) और रमेश शर्मा (चित्तौड़गढ़) ने गीतों की छटा बिखेरी । शायर निदा फ़ाज़ली, देवमणि पाण्डेय और हस्तीमल हस्ती ने ग़ज़लों, दोहों और नज़्मों से अदभुत समां बांधा । हास्य कवि आसकरण अटल की हास्य कविताओं ने श्रोताओं को लोटपोट कर दिया ।

परिवा पुरस्कार समरोह में सुरेशचंद्र शर्मा, शचीन्द्र त्रिपाठी, विश्वनाथ सचदेव, पं राम नारायण, प्रो.नंदलाल पाठक और रामस्वरूप गाड़िया
दूसरे दौर में रमेश शर्मा ने शहर के विरोध और गाँव की प्रशंसा में एक ऐसा गीत सुनाया जिसे सुनकर हाल में सन्नाटा छा गया । सन्नाटे को तोड़ते हुए संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा – राजस्थान के गाँव इतने सुँदर हो सकते हैं मगर हमारे उ.प्र. के गाँव बहुत बदल गए हैं । इसी मंच पर कवि कैलाश गौतम ने कहा था- अब उ.प्र. के गाँवों में किराना स्टोर्स में पाउच (पन्नी) में शराब बिकती है । उन्होंने एक दोहा सुनाया था-
पन्नी में दारू बँटी पंच हुए सब टंच ।
सबसे ज़्यादा टंच जो वही हुआ सरपंच ।।
भगवान कृष्ण के वंशज भी कितने बदल गए हैं, इस पर भी कैलाश जी ने एक दोहा सुनाया था-
दूध दुहे , बल्टा भरे गए शहर की ओर ।
शाम हुई, दारू पिए लौटे नंदकिशोर ।।

जब संचालक पाण्डेय जी ने यह दोहा उद्धरित किया तब श्रोताओं ने ज़ोरदार ठहाका लगाया शायद इस लिए कि पहली पंक्ति में नंदकिशोर जी यानी वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल मौजूद थे । कुल मिलाकर हर साल की तरह परिवार का काव्य उत्सव इस बार भी श्रोताओं के दिलो-दिमाग़ पर अपनी छाप छोड़ गया ।

Saturday, January 16, 2010

शायरी ख़ुदकशी का धंधा है

हाल ही में प्रो.नंदलाल पाठक का काव्य संकलन ‘फिर हरी होगी धरा’ स्टर्लिंग पब्लिशर्स, ए-59, ओखला इंड., फेज-2, नई दिल्ली-110020 से प्रकाशित हुआ है। क़ीमत है 200/- रूपए । हिंदी ग़ज़ल के प्रमुख हस्ताक्षर प्रो.नंदलाल पाठक अपनी ग़ज़लों में अपने समय को बख़ूबी अभिव्यक्त करते हैं –

वे जो सूरज के साथ तपते हैं / उनको इक शाम तो सुहानी दो
खेत की ओर ले चलो दिल्ली / गाँव वालों को राजधानी दो

उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी कमाल का है-

मुझको मंज़ूर है बुढ़ापा भी / लेखनी को मेरी जवानी दो

बनारसी कवि नंदलाल पाठक जीवन के 81 बसंत पार कर चुक हैं । उनकी रचनाओं में इतनी ताज़गी इसलिए है क्योंकि उन्होंने आज तक बचपन को ख़ुद से जुदा नहीं होने दिया । वे लिखते हैं –

कल तितलियाँ दिखीं तो मेरे हाथ बढ़ गए
मुझको गुमान था कि मेरा बचपन गुज़र गया

अपने दौर के प्रमुख शायरों की तरह पाठकजी भी ने हिंदी ग़ज़ल को एक नई परिभाषा दी है –

ज़िंदगी कर दी निछावर तब कहीं पाई ग़ज़ल
कुछ मिलन की देन है तो कुछ है तनहाई

उन्होंने अपनी हिंदी ग़ज़लों को हिंदुस्तानी बिम्बों, प्रतीकों और उपमानों से समृद्ध किया है । मसलन –

ज़हर पीता हुआ हर आदमी शंकर नहीं होता
जब तक आदमी इंसान हो शायर नहीं होता
ज़रूरत आपको कुछ भी नहीं सजने सँवरने की
किसी हिरनी की आँखों में कभी काजल नहीं होता

पाठकजी की ग़ज़लों में एक फ़कीराना अदा है । उन्होंने दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल परम्परा को आगे बढ़ाने की शानदार कोशिश की है –

उतारें क़ाग़जों पर पुल तो इतना देख लेना था
जहाँ पुल बन रहा है उस जगह कोई नदी तो हो

एक अच्छा कवि हमेशा अपने समय से बहुत आगे होता है । पाठकजी ने भी ऐसे शेर कहे हैं जो इस सदी के आने वाले सालों का प्रतिनिधित्व करते हैं –

क़दम क़दम पर है फूलमाला, जगह जगह है प्रचार पहले
मरेगा फ़ुर्सत से मरने वाला बना दिया है मज़ार पहले

पाठकजी के अनुसार ग़ज़ल लेखन एक ज़िम्मेदारी और मुश्किलोंभरा काम है । उनकी बात का समर्थन उनका एक मुक्तक भी करता है –

शायरी ख़ुदकशी का धंधा है / लाश अपनी है अपना कंधा है
आईना बेचता फिरा शायर / उस शहर में जो शहर अंधा है

कभी कभी पाठकजी ऐसे शब्दों का भी ख़ूबसूरत इस्ते माल करते हैं जो रोज़मर्रा के व्यवहार से ग़ायब हो गए हैं, मसलन ‘व्योम’ –

वे अपने क़द की ऊँचाई से अनजाने रहे होंगे
जो धरती की पताका व्योम में ताने रहे होंगे
अकेले किसके बस में था कि गोबर्धन उठा लेता
कन्हैया के सहायक और दीवाने रहे होंगे

पाठकजी का कहना है कि अगर उर्दू वाले ‘गगन’ जैसे संस्कृत शब्द का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर सकते हैं तो हमें ‘व्योम’ जैसे म्यूज़िकल शब्दों के इस्तेमाल में कंजूसी नहीं करनी चाहिए । अंत में पाठक जी का एक मुक्तक आप सबकी नज़र कर रहा हूं –

ज़िंदगी मौत को हरा देगी / यह मेरी आस मिट नहीं सकती
रोशनी घट चली है आँखों की / रूप की प्यास मिट नहीं
आप पाठकजी को सम्पर्क कर सकते - o97022-77879 / o22 – 2636 8457

Friday, January 15, 2010

इश्क़ ने हमको सौग़ात में क्या दिया






देवमणि पांडेय की दो ग़ज़लें
 (1)
दिल ने चाहा बहुत पर मिला कुछ नहीं
ज़िन्दगी हसरतों के सिवा कुछ नहीं

उसने रुसवा सरेआम मुझको किया
उसके बारे में मैंने कहा कुछ नहीं

इश्क़ ने हमको सौग़ात में क्या दिया
ज़ख़्म ऐसे कि जिनकी दवा कुछ नहीं

पढ़के देखीं किताबें मुहब्बत की सब
आँसुओं के अलावा लिखा कुछ नहीं

हर ख़ुशी मिल भी जाए तो क्या फ़ायदा
ग़म अगर न मिले तो मज़ा कुछ नहीं

ज़िन्दगी मुझसे अब तक तू क्यों दूर है
दरमियां अपने जब फ़ासला कुछ नहीं

(2)
इस दिल को जो मिला है वो दर्द किससे बाँटें
पत्थर की बस्तियों में हम उम्र कैसे काटें

ये क्या हुआ लबों की मुस्कान क्यों है ज़ख़्मी
बच्चों को आप डाँटें ऐसे मगर न डाटें

है वक़्त का तक़ाज़ा नज़रों में वो हुनर हो
कंकड़ के ढेर से बस हीरों को आप छाँटें

दिन का हरेक लम्हा वो दर्द दे गया है
तारे न हम गिनें तो रातों को कैसे काटें

साकार होगी उस पल ख़्वाबों की एक दुनिया
जो बीच हैं दिलों के उन दूरियों को पाटें

नई नवेली दुल्हन जैसी हर पल लगती नई
प्यार से इसको सब कहते हैं आई लव यू मुंबई

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 


Thursday, January 14, 2010

मालूमात का गहरा समंदर

'संगीत के जवाहरात' के लोकार्पण समारोह में पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी, कवि - गीतकार देवमणि पाण्डेय, वरिष्ठ सितारवादक अरविंद पारेख , विश्वविख्यात संतूरवादक पं।शिवकुमार शर्मा और उस्ताद मो. सईद ख़ाँ
हरियाणा के झज्जर घराने के सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद अब्दुल मजीद ख़ाँ और उनके जोड़ीदार तबला वादक मास्टर सिद्दीक़ को एक गायिका के साथ संगत करने के लिए भोपाल के नवाब के यहां से न्यौता आया। कार्यक्रम शाही हरम में था। आज़ादी से पहले के उस दौर में मर्दों को बेग़मों के सामने जाने की मनाही थी। इस लिए दोनों साजिन्दों की आँख पर पट्टी बांध दी गई। इस हाल में भी उस्ताद मजीद ख़ाँ ने सारंगी पर ऐसा रंग जमाया कि बेग़मों ने भाव विभोर होकर कहा - इनकी पट्टी खोल दो। यह रोचक क़िस्सा जिस किताब में दर्ज है उस किताब का नाम है 'संगीत के जवाहरात'। इसे लिखा है हालैंड में रहने वाले भारतीय संगीतज्ञ उस्ताद मोहम्मद सईद ख़ाँ ने और उनके साथ सहलेखक हैं नवभारत टाइम्स, मुंबई के मुख्यउपसंपादक भुवेन्द्र त्यागी । इस पुस्तक में 115 रागों की 238 बंदिशों के बोल, अर्थ और स्क्रीनप्ले यानी सप्रसंग भावार्थ दिए गए गए हैं। पुस्तक के साथ में एक सीडी भी है जिसमें मो.सईद ख़ाँ के ओजस्वी स्वर में साढ़े सात घंटे का गायन है। तीन दशकों से पश्चिमी देशों में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में सक्रिय मो. सईद ख़ाँ झज्जर घराने के वारिस होने के साथ ही जयपुर घराने की गायिकी परम्परा के वरिष्ठतम सदस्यों में से एक हैं। उन्होंने संगीत को विज्ञान, कला और मनोरंजन का संगम मानने का सिंद्धांत प्रपादित किया। उनके वालिद उस्ताद अब्दुल मजीद ख़ाँ महान सारंगी वादक बुंदू ख़ाँ के शागिर्द थे। सन् 1921 में वे मुम्बई आए और यहां महान गायिका केसरबाई केरकर के साथ आजीवन संगत करके बहुत नाम कमाया। केसरबाई की गायिकी से वे इतने प्रभावित थे कि 1938 में उनके गुरु अल्लादिया ख़ाँ से गायन सीखा और अपने दोनों बेटों- सईद ख़ाँ और रशीद ख़ाँ को गायन का यह हुनर सिखाया। संगीत के इस विशाल ज्ञान और अपने विशद अनुभवों के निचोड़ को मो. सईद ख़ाँ ने एक ख़ूबसूरत पुस्तक का रूप दिया। इस महत्त्वपूर्ण कार्य में उनकी सहायता लेखक-पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी ने की। कुल मिलाकर उन्होंने पयाम सईदी के इस शेर को सार्थकता प्रदान की-

असासा माल और दौलत से बढ़कर छोड़ जाऊंगा
मैं मालूमात का गहरा समंदर छोड़ जाऊंगा

अंत में इस किताब से गुज़रे दौर का एक रोचक क़िस्सा और सुनिए-

मुरादाबाद के संगीतज्ञ अशरफ़ ख़ाँ एक अलग तरह की अस्थायी बजाते थे। उस्ताद बुंदू ख़ाँ ने कहा-''मुझे वह अस्थायी सिखा दो।'' वे बोले- ''पहले आप मेरे बेटे की शादी करवा दो। उसकी शादी कहीं नहीं हो रही है।'' यह सुनकर उस्ताद बुंदू ख़ाँ आग बबूला हो गए। घर जाकर उन्हें याद आया कि उनके किसी मामा की लड़की बेवा या तलाकशुदा है। उन्होंने मामा से बात की और अशरफ़ ख़ाँ के बेटे के साथ उनकी लड़की की शादी करवा दी। इस तरह उन्होंने अस्थायी सीखकर ही दम लिया। 'संगीत के जवाहरात' पुस्तक वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से पिछले साल प्रकाशित हुई । इसका मूल्य 495/- रूपए है।
सम्पर्क : भुवेन्द्र त्यागी 098691-76433 / bhuvtyagi@gmail.com

Monday, January 11, 2010

पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र

क़रीब दस साल पहले भोपाल के वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने मुम्बई की एक दोस्ताना महफ़िल में ताज भोपाली के ये शेर सुनाए थे –

पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र
किससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे
मैं ताज हूँ तू अपने सर पे सजाके देख
या मुझको यूँ गिरा के ज़माना मिसाल दे


मोहम्मद अली ताज उर्फ़ ताज भोपाली किसी ज़माने में भोपाल के मशहूर होटल ‘अहद’ के मालिक थे । वे दिन में अपने होटल से जो कमाते थे शाम को उसे मयख़ाने में उड़ाते थे ।उनके चारों तरफ़ नौजवानों का हुजूम होता था । गपशप के दौरान वे अचानक कोई शेर कह डालते थे । कहने के बद भूल जाते थे । कोई नौजवान नोट करके दूसरे दिन उनका शेर उन्हें सुनाता तो बड़ी हैरत से पूछते-‘’क्या सचमुच इतना बढ़िया शेर मैने कहा है ?’’ कवि राजेश जोशी ने भी कई बार उनके शेर नोट किए थे । बहरहाल उनकी शराबनोशी ने उनका होटल बंद करवा दिया तो मजरूह सुलतानपुरी की सलाह पर वे फ़िल्मों में गीत लिखकर पैसा कमाने के लिए वे मुम्बई आ गए । मालाड में एक फ़िल्म निर्माता एस.एम.सागर के यहाँ उन्हें सर छुपाने को छत मिल गई। यहां शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने उन्हें मेहमानों के कप-गिलास उठाते देखा बड़े दुखी हुए । फिर वे ताज साहब को अपने साथ कई मुशायरों में ले गए । मुशायरों में उन्हें काफी पसंद किया जाता था । मगर फ़िल्म नगरी को वे और फ़िल्म नगरी उन्हें रास नहीं आई तो भोपाल वापस लौट गए । ज़फ़र साहब का कहना है कि वे किसी दरवेश की तरह बड़े अच्छे इंसान और उम्दा शायर थे । एक मित्र ने बताया कि हिंदी ग़ज़ल के शिखर दुष्यंत कुमार उनसे बहुत प्रभावित थे ।वे अपनी ग़ज़लें दिखाने के लिए ताज साहब के पास गए भी थे । ताज साहब ने उन्हें सलाह दी कि उनकी ग़ज़लों का तेवर इतना अलग और मौलिक है कि उसे किसी इस्लाह की ज़रूरत ही नहीं है। यही तेवर एक दिन उन्हें अलग पहचान दिलाएगा । और हुआ भी वही ।

Monday, January 4, 2010

कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया


देवमणि पांडेय की दो ग़ज़लें
(1)
हम जब गिरे तो हमको सँभलना सिखा दिया
कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया

ख़्वाबों के कुछ परिंदों ने आकाश छू लिया
और ज़िंदगी ने दुख में बहलना सिखा दिया

आया तेरा ख़याल तो रोशन हुई हयात
उम्मीद के चराग़ ने जलना सिखा दिया

गुज़रा है तेरी याद का झोंका अभी-अभी
लम्हों को इंतज़ार में ढलना सिखा दिया

कुछ बर्फ़ जम गई थी निगाहों के दरमियां
एहसास की तपिश ने पिघलना सिखा दिया

वो कौन है सलाम कहो तुम उसे मेरा
मौसम के साथ जिसने बदलना सिखा दिया

(2)
ख़्वाबों से क्या मिला है ख़यालों से क्या मिला
हम क्या बताएं चाहने वालों से क्या मिला

इक नूर मेरे ज़हन को पुरनूर कर गया
मैं क्या कहूँ किताबों-रिसालों से क्या मिला

लफ़्जों में रंग आ गया अंदाज़ में कशिश
यूँ देखिए गज़ल को ग़ज़ालों से क्या मिला

इक तीरगी का खड़ी है सूरज के आस-पास
और लोग पूछते हैं उजालों से क्या मिला

मेरे किसी सवाल का देते नहीं जवाब
ऊपर से कि सवालों से क्या मिला

र पर किसी के ताज है मुहताज है कोई
ऐ वक़्त ये बता तेरी चालों से क्या मिला

देवमणि पांडेय : 98210-82126
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