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Monday, January 4, 2010

कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया


देवमणि पांडेय की दो ग़ज़लें
(1)
हम जब गिरे तो हमको सँभलना सिखा दिया
कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया

ख़्वाबों के कुछ परिंदों ने आकाश छू लिया
और ज़िंदगी ने दुख में बहलना सिखा दिया

आया तेरा ख़याल तो रोशन हुई हयात
उम्मीद के चराग़ ने जलना सिखा दिया

गुज़रा है तेरी याद का झोंका अभी-अभी
लम्हों को इंतज़ार में ढलना सिखा दिया

कुछ बर्फ़ जम गई थी निगाहों के दरमियां
एहसास की तपिश ने पिघलना सिखा दिया

वो कौन है सलाम कहो तुम उसे मेरा
मौसम के साथ जिसने बदलना सिखा दिया

(2)
ख़्वाबों से क्या मिला है ख़यालों से क्या मिला
हम क्या बताएं चाहने वालों से क्या मिला

इक नूर मेरे ज़हन को पुरनूर कर गया
मैं क्या कहूँ किताबों-रिसालों से क्या मिला

लफ़्जों में रंग आ गया अंदाज़ में कशिश
यूँ देखिए गज़ल को ग़ज़ालों से क्या मिला

इक तीरगी का खड़ी है सूरज के आस-पास
और लोग पूछते हैं उजालों से क्या मिला

मेरे किसी सवाल का देते नहीं जवाब
ऊपर से कि सवालों से क्या मिला

र पर किसी के ताज है मुहताज है कोई
ऐ वक़्त ये बता तेरी चालों से क्या मिला

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 
https://twitter.com/DevmaniPandey5

6 comments:

अजय कुमार said...

हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

संगीता पुरी said...

इस नए वर्ष में नए ब्‍लॉग के साथ आपका हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में स्‍वागत है .. आशा है आप यहां नियमित लिखते हुए इस दुनिया में अपनी पहचान बनाने में कामयाब होंगे .. आपके और आपके परिवार के लिए नया वर्ष मंगलमय हो !!

सतपाल said...

अगर कुछ नहीं है कमी ज़िंदगी में
तो फिर क्यों नहीं है ख़ुशी ज़िंदगी में
wahwa!!
daad qabool karen!

dweepanter said...

नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ द्वीपांतर परिवार आपका ब्लाग जगत में स्वागत करता है।

sumita said...

गर कुछ नहीं है कमी ज़िंदगी में
तो फिर क्यों नहीं है ख़ुशी ज़िंदगी में
बहुत खूब...अच्छी पंक्तियां..बधाई!

नीरज गोस्वामी said...

इक लड़की गुमसुम बैठी है फुलवारी के बीच
उस पर इन फूलों का गहना अच्छा लगता है
****
लबों से मुस्कराहट छिन गई है
ये है अंजाम अपनी सादगी का

लाजवाब शेरों से सजी कमाल की ग़ज़लें...वाह...
नीरज