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Thursday, January 14, 2010

मालूमात का गहरा समंदर

'संगीत के जवाहरात' के लोकार्पण समारोह में पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी, कवि - गीतकार देवमणि पाण्डेय, वरिष्ठ सितारवादक अरविंद पारेख , विश्वविख्यात संतूरवादक पं।शिवकुमार शर्मा और उस्ताद मो. सईद ख़ाँ
हरियाणा के झज्जर घराने के सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद अब्दुल मजीद ख़ाँ और उनके जोड़ीदार तबला वादक मास्टर सिद्दीक़ को एक गायिका के साथ संगत करने के लिए भोपाल के नवाब के यहां से न्यौता आया। कार्यक्रम शाही हरम में था। आज़ादी से पहले के उस दौर में मर्दों को बेग़मों के सामने जाने की मनाही थी। इस लिए दोनों साजिन्दों की आँख पर पट्टी बांध दी गई। इस हाल में भी उस्ताद मजीद ख़ाँ ने सारंगी पर ऐसा रंग जमाया कि बेग़मों ने भाव विभोर होकर कहा - इनकी पट्टी खोल दो। यह रोचक क़िस्सा जिस किताब में दर्ज है उस किताब का नाम है 'संगीत के जवाहरात'। इसे लिखा है हालैंड में रहने वाले भारतीय संगीतज्ञ उस्ताद मोहम्मद सईद ख़ाँ ने और उनके साथ सहलेखक हैं नवभारत टाइम्स, मुंबई के मुख्यउपसंपादक भुवेन्द्र त्यागी । इस पुस्तक में 115 रागों की 238 बंदिशों के बोल, अर्थ और स्क्रीनप्ले यानी सप्रसंग भावार्थ दिए गए गए हैं। पुस्तक के साथ में एक सीडी भी है जिसमें मो.सईद ख़ाँ के ओजस्वी स्वर में साढ़े सात घंटे का गायन है। तीन दशकों से पश्चिमी देशों में हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन के क्षेत्र में सक्रिय मो. सईद ख़ाँ झज्जर घराने के वारिस होने के साथ ही जयपुर घराने की गायिकी परम्परा के वरिष्ठतम सदस्यों में से एक हैं। उन्होंने संगीत को विज्ञान, कला और मनोरंजन का संगम मानने का सिंद्धांत प्रपादित किया। उनके वालिद उस्ताद अब्दुल मजीद ख़ाँ महान सारंगी वादक बुंदू ख़ाँ के शागिर्द थे। सन् 1921 में वे मुम्बई आए और यहां महान गायिका केसरबाई केरकर के साथ आजीवन संगत करके बहुत नाम कमाया। केसरबाई की गायिकी से वे इतने प्रभावित थे कि 1938 में उनके गुरु अल्लादिया ख़ाँ से गायन सीखा और अपने दोनों बेटों- सईद ख़ाँ और रशीद ख़ाँ को गायन का यह हुनर सिखाया। संगीत के इस विशाल ज्ञान और अपने विशद अनुभवों के निचोड़ को मो. सईद ख़ाँ ने एक ख़ूबसूरत पुस्तक का रूप दिया। इस महत्त्वपूर्ण कार्य में उनकी सहायता लेखक-पत्रकार भुवेन्द्र त्यागी ने की। कुल मिलाकर उन्होंने पयाम सईदी के इस शेर को सार्थकता प्रदान की-

असासा माल और दौलत से बढ़कर छोड़ जाऊंगा
मैं मालूमात का गहरा समंदर छोड़ जाऊंगा

अंत में इस किताब से गुज़रे दौर का एक रोचक क़िस्सा और सुनिए-

मुरादाबाद के संगीतज्ञ अशरफ़ ख़ाँ एक अलग तरह की अस्थायी बजाते थे। उस्ताद बुंदू ख़ाँ ने कहा-''मुझे वह अस्थायी सिखा दो।'' वे बोले- ''पहले आप मेरे बेटे की शादी करवा दो। उसकी शादी कहीं नहीं हो रही है।'' यह सुनकर उस्ताद बुंदू ख़ाँ आग बबूला हो गए। घर जाकर उन्हें याद आया कि उनके किसी मामा की लड़की बेवा या तलाकशुदा है। उन्होंने मामा से बात की और अशरफ़ ख़ाँ के बेटे के साथ उनकी लड़की की शादी करवा दी। इस तरह उन्होंने अस्थायी सीखकर ही दम लिया। 'संगीत के जवाहरात' पुस्तक वाणी प्रकाशन नई दिल्ली से पिछले साल प्रकाशित हुई । इसका मूल्य 495/- रूपए है।
सम्पर्क : भुवेन्द्र त्यागी 098691-76433 / bhuvtyagi@gmail.com

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