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Tuesday, May 31, 2011

दुपट्टे में लिपटी हो अँगड़ाई जैसे





डलहौज़ी में एक सुबह

हर कली ओस में भीगकर
कैसे चुपचाप सोई हुई है
सब्ज़ पत्तों पे मुस्काए मोती
शाख़ सपनों में खोई हुई है

चाँदनी की फुहारों में जैसे
रूह धरती की धोई हुई है
आसमानों से बरसी है शबनम
या कोई आँख रोई हुई है





मनाली में एक शाम

यहाँ हसरतों से भी ऊँचे हैं पर्वत
उमंगो की रंगीन गहराइयाँ हैं
मस्ती का आलम दिलों में जगाएं
दरख़्तों की कुछ ऐसी अँगड़ाइयाँ हैं

यहां रंग मौसम के कितने निराले
हरियाली ऐसी कि दिल को चुरा ले
शाखों को छूकर हवा झूमती है
कोई ख़ुद को ऐसे में कैसे सँभाले

झरने से जैसे रुई झर रही
वादी में कोई परी हँस रही है
बिखरी हों ज़ुल्फ़ें अचानक किसी की
पहाड़ों पे ये शाम यूँ घिर रही है

यहाँ इतनी सुंदरता आई है कैसे
ख़ुदा ने ये वादी बनाई है जैसे
बिछी है शिखर पे सफेदी की चादर
दुपट्टे में लिपटी हो अँगड़ाई जैसे
  

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com