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Monday, July 25, 2011

चिड़िया ने बच्चे के आगे चोंच से दाना फेंका



ज़फ़र गोरखपुरी के गीत


ज़फ़र गोरखपुरी की जड़ें गाँव में हैं। इसलिए खेत, बाग़, पनघट, नदी, तालाब, किसान, फ़सल, चौपाल, सावन-भादों वग़ैरह ज़फ़र के एहसास का अटूट हिस्सा हैं। और यही उनका सबसे बड़ा ख़ज़ाना भी है। इन्हें पढ़ने वाला शख़्स गाँव पहुँच जाता है।

ज़फ़र का अंदाज़ दिल को छू लेने वाला अंदाज़ है। उनके गीतों में इंसानी जज्ब़ात और एहसासात की बेक़रार लहरे हैं। वहाँ इंसानी पीड़ा, गम़ की धीमी-धीमी आँच, समाजी वाक़यात की हलकी, गहरी परछाइयाँ और ज़िंदगी की लड़ाई में पीछे छूट गए इंसान का दुख-दर्द साँस लेता है। मिलन और जुदाई के रंग भी इनके गीतों में हैं लेकिन इनके यहाँ ये सारी चीज़ें सामाजिक सरोकार के साथ हाज़िर होती हैं।

उनके गीत साफ़, सुरीले, और बामानी हैं। मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं है कि उर्दू-हिंदी के ख़ज़ाने में ज़फ़र के गीत क़ीमती इज़ाफ़ा हैं, बल्कि यूँ कहा जाए कि ये गीत एक ऐसे मोड़ का पता देते हैं जहाँ से गीतों का एक नया क़ाफ़िला आगे की ओर रवाना होगा। ज़फ़र गोरखपुरी ने कई लोकप्रिय फ़िल्मों में गीत लिखे हैं। ‘किताबें बहुत सी पढीं होंगी तुमने / कभी कोई चेहरा भी तुमने पढ़ा है’ (बाज़ीगर), ‘ये आईने जो तुम्हें कम पसंद करते हैं / इन्हें पता है तुम्हें हम पसंद करते हैं’ (तमन्ना), ‘और आहिस्ता कीजिए बातें, धड़कनें कोई सुन रहा होगा’ (दि स्टोलन मूमेंट) जैसे स्तरीय और सुपरहिट गीत लिखने वाले ज़फ़र गोरखपुरी चाहते हैं कि उन्हें फ़िल्म के हवाले से नहीं बल्कि अदब के हवाले से जाना जाए।
-देवमणि पांडेय





(1) लाल लाल मिट्टी
हरे भरे
गाँव की ...... लाल लाल मिट्टी

बच गए रेवड़ सलामत हैं द्दप्पर
मिट्टी में खेलेंगे बच्चे बरसभर
सरहद से घूम गई
बाढ़ सखी आकर
करने से बच गई बाल बाल मिट्टी
-लाल लाल मिट्टी

खेतों पे सूरज का लावा सा छलका
क़तरा पसीने का माथे से ढलका
साजन तू छू ले
तोहर बोझ हल्का
खाँची में थोड़ी सी और डाल मिट्टी
-लाल लाल मिट्टी

गोरी खजूर तले बैठी हुई है
गुमसुम है चुप चुप है खोई हुई है
गौने की तारीख़
पक्की हुई है
हवा लट उड़ाए , हुए गाल मिट्टी

हरे-भरे
गाँव की ...... लाल लाल मिट्टी

(2) फ़ोन पर गोरी
सर पे पल्लू है
और
हाथ में फ़ोन है
फ़ोन पर गोरी साजन से बातें करे

ख़त पहुंच जाएगा, शायद ऐसा नहीं
डाक वालों का कोई भरोसा नहीं
ख़त मिले न मिले
सोचकर जी डरे
फ़ोन पर गोरी साजन से बातें करे

हेलो हेलो सजन.......
कुछ सुना आपने.......
फ़ोन क्या मोबाइल भी है गाँव में
कार आकर खड़ी नीम की छाँव में
हाट-बाज़ार सब
शहर जैसे भरे
फ़ोन पर गोरी साजन से बातें करे

हेलो हेलो पिया
सुन रहे हो न तुम......
बाबा बीमार हैं, फ़स्ल आई नहीं
हाथ ख़ाली हैं बस में दवाई नहीं
रात सर्दी से
दादा ठिठरकर मरे
फ़ोन पर गोरी साजन से बातें करे

(3) ख़ुशबू-मैंने तुझको देखा
चिड़िया ने बच्चे के आगे
चोंच से दाना फेंका
ख़ुशबू
मैंने तुझको देखा

चम्पा सारे गाँव की बेटी
तन पर ब्याह का जोड़ा
आँगन की कच्ची मिट्टी ने
लाला दुशाला ओढ़ा
छेड़, शरारत, हल्दी,मेंहदी
जो भी करो सब थोड़ा

राधा के हाथों में ढोलक, तान उड़ाए ज़ुलेखा
ख़ुशबू
मैंने तुझको देखा

एक लड़का परदेस को जाए
सारा घर बेक़ाबू
काँधे पर ख़्वाबों की गठरी
उजले शहर का जादू
बच्चे, बूढ़े,टोला-मोहल्ला
सबकी आंख में आँसू
तपते रिश्ते, छाँव दुआ की, आशीर्वाद का टेका
ख़ुशबू
मैंने तुझको देखा

हैवानों का गोल कहीं से
बस्ती भीतर आया
ख़ून उड़ा, धरती थर्राई
आसमान चिल्लाया
हमसाए ने हमसाए के
बच्चे को लिपटाया

दुख-सुख के रिश्ते से छोटी दीन-धरम की रेखा
ख़ुशबू
मैंने तुझको देखा

(4) किधर गई बारिश
किधर गई बारिश
किधर गई बारिश
चूनर भिगोकर
अगिन मन में बोकर
चोरों सी कैसी गुज़र गई बारिश
किधर गई बारिश

ऊँचे पहाड़ों की गलियों से आई
बालों से उलझी, बदन में समाई
छाती को चीरा
तनमन को फूँका
आँखों में आकर ठहर गई बारिश
किधर गई बारिश

माटी ज़ुबां मुँह से बाहर निकाले
पेड़ों के जिस्मों पे फूलों के छाले
अम्बर पे घूमें
नीचे न उतरें
लगता है प्यासों से डर गई बारिश
किधर गई बारिश

अच्छी भली थी बसा ध्यान में क्या
जाने हवा ने कहा कान में क्या
नहरों से बचती
नालों से बचती
दरिया में सीधे उतर गई बारिश
किधर गई बारिश

ओ री सखी ऐसी क्या थी लड़ाई
अबके तो तन भी जलाने न आई
कोई बताए
समझ में न आए
ज़िंदा है बारिश कि मर गई बारिश
किधर गई बारिश




(5) बादल में गिनती की बूंदें
जब दिल ने ये जाना साजन
कच्चे हैं सब बंधन
मैंने
ध्यान में तुमको बाँधा
जा न सकोगे, अब दरवाज़ा पूरा खुले या आधा

कोहरा था पलकों के नीचे
धुंध जमी थी मन पर
आज तो बस आँखें ही आँखें
उगी हैं सारे तन पर
कहाँ छुपोगे, हर कोने से देख रही है राधा
मैंने
ध्यान में तुमको बांधा

वक़्त ने पल पल दामन पकड़ा
जग ने हाँक लगाई
सिवा तुम्हारी आवाज़ों के
और न कुछ सुन पाई
अब चाहे बदनामी दो तुम या राखो मर्यादा
मैंने
ध्यान में तुमको बांधा

दिल पर ऐसे छम छम बरसो
जैसे बरसे पानी
धानी चूनर भीगके साजन
और हो जाए धानी
बादल में गिनती की बूंदें मन की प्यास ज़ियादा
मैंने
ध्यान में तुमको बाँधा

(6) जीवन तू क्या जाने

तन भोगी
मन जोगी
जीवन तू क्या जाने हम पर क्या कुछ बीती होगी

तन माँगे है छप्पर छाया
कपड़ा, दाना-पानी
मन को इनसे लाग नहीं कुछ
मन की अलग कहानी
मन जनमों से चंदन जैसा तन जनमों का रोगी

तन सौदागर लोभ का मारा
माल गिने धन जोड़े
मन पागल बस दर्द बटोरे
बाक़ी चीजें छोड़े
तन को बस एक अपनी चिंता मन सबका सहयोगी

मन सीमाएं तोड़ना चाहे
तन अपने में सिकुड़ा
दो पाटों के बीच में सारा जीवन टुकड़ा-टुकड़ा
सोचो इस संसार में हमने कैसे बसर की होगी
तन भोगी
मन जोगी




सम्पर्क : ज़फ़र गोरखपुरी
ए-302, फ्लोरिडा, शास्त्री नगर, अँधेरी (पश्चिम), मुम्बई-400 053, फोन : 022-2636 9313

Friday, July 8, 2011

बारिश के सुहाने मौसम में

गायक राजकुमार रिज़वी कवि देवमणि पांडेय और शायर ज़फ़र गोरखपुरी


कल रात्त सही मायनों में मुम्बई में मौसम की पहली बारिश हुई। रात भर बारिश की पाजेब से छम-छम की आवाज़ें आ रहीं थीं। आज सुबह खिड़की से बाहर झाँका तो इमारतों के धुले हुए चेहरे बहुत सुंदर लग रहे थे। मेरे परिसर के पेड़ों पर जमी हुई धूल और धुँए की परत साफ़ हो गई थी। तन पर हरियाली की शाल ओढ़े हुए दरख़्त मस्ती में झूम रहे थे। दो-तीन फीट पानी में डूबी हुई सड़क के सीने पर तेज़ रफ़्तार में जैसे झरना बह रहा था। सामने की खिड़कियों में फूल जैसे चेहरे मुस्करा रहे थे। पानी को चीरकर आगे बढ़ती हुईं गाड़ियाँ मन में उल्लास जगा रहीं थीं। कॉलोनी के पार्क में गुलमोहर के पेड़ों के नीचे सुर्ख़ फूलों की चादर बिछी हुई है। परवीन शाकिर का शेर याद आ गया-


बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
मौसम के हाथ भीगकर शफ्फ़ाक हो गए


बारिश के ऐसे सुहाने मौसम में मेरे एक गीत का लुत्फ़ उठाइए साथ में शायर ज़फ़र गोरखपुरी की एक दिलकश ग़ज़ल भी पेशे-ख़िदमत है।


देवमणि पांडेय का गीत

खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
होती है सभी से भूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।

यह चाँद पुराना आशिक़ है
दिखता है कभी छिप जाता है
छेड़े है कभी ये बिजुरी को
बदरी से कभी बतियाता है

यह इश्क़ नहीं है फ़िज़ूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।

बादल की सुनी जब सरगोशी
बहके हैं क़दम पुरवाई के
बूंदों ने छुआ जब शाख़ों को
झोंके महके अमराई के

टूटे हैं सभी के उसूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।

यादों का मिला जब सिरहाना
बोझिल पलकों के साए हैं
मीठी सी हवा ने दस्तक दी
सजनी कॊ लगा वॊ आए हैं

चुभते हैं जिया में शूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।



कवि देवमणि पांडेय और चित्रकार अवधेश मिश्र


ज़फ़र गोरखपुरी की ग़ज़ल

जिस्म छूती है जब आ आ के पवन बारिश में
और बढ़ जाती है कुछ दिल की जलन बारिश में

मेरे अतराफ़ छ्लक पड़ती हैं मीठी झीलें
जब नहाता है कोई सीमबदन बारिश में

दूध में जैसे कोई अब्र का टुकड़ा घुल जाए
ऐसा लगता है तेरा सांवलापन बारिश में

नद्दियां सारी लबालब थीं मगर पहरा था
रह गए प्यासे मुरादों के हिरन बारिश में

अब तो रोके न रुके आंख का सैलाब सखी
जी को आशा थी कि आएंगे सजन बारिश में

Friday, July 1, 2011

आँगन-आँगन बरसे गीत

कवयित्री दीप्ति मिश्र के काव्य संग्रह ‘है तो है’ के लोकार्पण समारोह में कवयित्री दीप्ति मिश्र, शायर-संचालक देवमणि पांडेय, लोकमंगल के अध्यक्ष स्व।रामनारायण सराफ, शायर निदा फाज़ली और शायर नक़्श लायलपुरी (मुम्बई 19 नवम्बर 2005)



आँगन-आँगन बरसे गीत



नक्श लायलपुरी की शायरी में ज़बान की मिठास, एहसास की शिद्दत और इज़हार का दिलकश अंदाज़ मिलता है। उनकी ग़ज़ल का चेहरा दर्द के शोले में लिपटे हुए शबनमी एहसास की लज़्ज़त से तरबतर है। उनकी शायरी में पंजाब की मिट्टी की महक, लखनऊ की नफ़ासत और मुंबई के समंदर का धीमा-धीमा संगीत है। फ़िल्मी नग़मों में भी जब उनके लफ़्ज़ गुनगुनाए गए तो उनमें भी अदब बोलता और रस घोलता दिखाई दिया। नक्श लायलपुरी का जन्म 24 फरवरी 1928 को लायलपुर (अब पाकिस्तान का फैसलबाद) में हुआ। उनके वालिद मोहतरम जगन्नाथ ने उनका नाम जसवंत राय तजवीज़ किया था। शायर बनने के बाद उन्होंने अपना नाम तब्दील किया। अब उनके अशआर इस क़दर दिलों पर नक़्श हो चुके हैं कि ज़माना उन्हें नक़्श लायलपुरी के नाम से जानता है। हाल ही में नक़्श लायलपुरी के फ़िल्म गीतों का एक संकलन आया है- 'आँगन-आँगन बरसे गीत'। यह किताब उर्दू में है। इसको मैंने हिंदी में रूपांतरित कर दिया है। अगले कुछ महीनों में यह किताब हिंदी में प्रकाशित हो जाएगी। इस किताब से छः गीत आपके लिए पेश कर रहा हूँ। इस किताब पर शायर अब्दुल अहद साज़ का एक ख़ूबसूरत आलेख आप पिछली पोस्ट में पढ़ सकते हैं।- देवमणि पांडेय



नक़्श लायलपुरी के फ़िल्म गीत

(1)
ये मुलाक़ात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है

धड़कनें धड़कनों में खो जाएं
दिल को दिल के क़रीब लाना है

मैं हूँ अपने सनम की बाहों में
मेरे क़दमों तले ज़माना है

ख्व़ाब तो काँच से भी ऩाजुक हैं
टूटने से इन्हें बचाना है

मन मेरा प्यार का शिवाला है
आपको देवता बनाना है

फ़िल्म : ख़ानदान संगीत : ख़य्याम स्वर : लता मंगेशकर

(2)
माना तेरी नज़र में तेरा प्यार हम नहीं
कैसे कहें कि तेरे तलबगार हम नहीं

दिल को जला के राख बनाया,बुझा दिया
लो अब तुम्हारी राह में दीवार हम नहीं

सींचा था जिसको हमने तमन्ना के ख़ून से
गुलशन में उस तमन्ना के हक़दार हम नहीं

धोखा दिया है ख़ुद को मुहब्बत के नाम पर
ये किस तरह कहें कि ख़तावार हम नहीं

फ़िल्म : आहिस्ता-आहिस्ता संगीत : ख़य्याम स्वर : सुलक्षणा पंडित

(3)
रस्मे उल्फ़त को निभाएं तो निभाएं कैसे
हर तरफ़ आग है दामन को बचाएं कैसे

दिल की राहों में उठाते हैं जो दुनिया वाले
कोई कह दे कि वो दीवार गिराएं कैसे

दर्द में डूबे हुए नग़में हज़ारों हैं मगर
साज़े-दिल टूट गया हो तो सुनाएं कैसे

बोझ होता जो ग़मों का तो उठा भी लेते
ज़िंदगी बोझ बनी हो तो उठाएं कैसे

फ़िल्म : दिल की राहें संगीत : मदन मोहन स्वर : लता मंगेशकर

(4)
आपकी बातें करें या अपना अफ़साना कहें
होश में दोनों नहीं हैं किसको दीवाना कहें

राज़े-उल्फ़त ज़िंदगी भर राज़ रहना चाहिए
आँखों ही आँखों में ये ख़ामोश अफ़साना कहें

आपकी बाहों में आकर खिल उठी है ज़िंदगी
इन बहारों को भला हम किसका नज़राना कहें

दिल के हाथों लुट के हमने कर लिया ये फ़ैसला
आपको अपना कहें और दिल को बेगाना कहें

फ़िल्म : दिल की राहें संगीत : मदन मोहन स्वर : लता मंगेशकर

(5)
भरोसा कर लिया जिस पर उसी ने हमको लूटा है
कहाँ तक नाम गिनवाएं सभी ने हमको लूटा है

हमारी बेबसी को मुस्कराकर देखने वालो
तुम्हारे शहर की इक इक गली ने हमको लूटा है

जो लुटते मौत के हाथों तो कोई ग़म नहीं होता
ग़म इस बात का है ज़िंदगी ने हमको लूटा है

कभी बढ़कर हमारा रास्ता रोका अँधेरों ने
कभी मंज़िल दिखाकर रोशनी ने हमको लूटा है

फ़िल्म : प्रभात संगीत : मदन मोहन स्वर : लता मंगेशकर

(6)
ये वही गीत है जिसको मैनें धड़कन में बसाया है
तेरे होंठो से इसको चुराकर होंठो पर सजाया है

मैंने ये गीत जब गुनगुनाया सज गई है ख़यालों की महफ़िल
प्यार के रंग आँखों में छाए मुस्कराई उजालों की महफ़िल

ये वो नग़मा है जो ज़िदगी में रोशनी बन के आया है
तेरे होंठो से इसको चुराकर होंठो पर सजाया है

मेरे दिल ने तेरा नाम लेकर जब कभी तुझको आवाज़ दी है
फूल ज़ुल्फों में अपनी सजा कर तू मेरे सामने आ गई है

तुझको अक्सर मेरी बेख़ुदी ने सीने से लगाया है
तेरे होंठो से इसको चुराकर होंठो पर सजाया है

फ़िल्म : मान जाइए संगीत : जयदेव स्वर : किशोर कुमार


ये मुलाकात इक बहाना है




नक़्श लायलपुरी के फिल्मी गीतों की साहित्यिक क़ीमत



ये मुलाकात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है


नक़्श लायलपुरी साहब के नाम से हमारे कान उस वक़्त से आशना हैं जब हम नौजवानी के ज़माने में रात की तन्हाई में रेडियो सीलोन सुना करते थे और उदघोषक की आवाज़ आती थी कि अब जो गीत आप सुनेंगे वो आशा भोसले और मु.रफ़ी की आवाज़ में फ़िल्म ‘अल्लादीन ऍन्ड दी वन्डरफुल लैम्प’ का है। संगीतकार हैं चित्रगुप्त और गीत के बोल लिखे हैं नक़्श लायलपुरी ने।



उस दौर को याद करते हुए अब ये बात कितनी गर्व की लगती है कि नक़्श साहब अपनी साहित्यिक और फ़िल्मी गीतकारी की आधी सदी से ज़्यादा की यात्रा पूरी कर चुकने के बाद माशाअल्लाह आज भी मानसिक रुप से जागरूक और सक्रिय हैं। उनका क़लम काग़ज़ पर और सिल्यूलाईड के फ़ीते पर आज भी चल रहा हैं। एक तरफ़ उनके पुराने गीतों को नौशाद, ख़य्याम, मदनमोहन और जयदेव जैसे उस्ताद संगीतकारों ने अपने सुरों से सजाया है और मु.रफ़ी, तलतमहमूद,लता मंगेशकर, आशा भोसले जैसे महान गायकों ने अपनी आवाज़ों में रचाया है। दूसरी तरफ़ इन दिनों फ़िल्मों और टी.वी सीरियलों के लिए आज के युग के संगीतकारों जैसे ललित सेन, सपन जगमोहन, कुलदीप सिंह आदि ने उनके नए गीतों को अपनी धुनों में उतारा है और आज के प्रसिद्ध गायकों जगजीत सिंह, उदित नारायण, हरिहरन,तलत अज़ीज़, कविता कृष्णमूर्ति और दूसरों ने अपनी आवाज़ों में रचाया है। पंकज उधास, भूपेंद्र, ग़ुलाम अली, अशोक खोसला आदि की आवाज़ में संगीतबद्ध किए हुए प्राइवेट अलबम भी इसमें जोड़ कर गिने जा सकते हैं।


नक़्श साहब ने हिंन्दुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्रीज का वो सुनहरा युग पाया है जब श्रेष्ठ श्रेणी के निर्देशक, कलाकार,संवाद लेखक, संगीतकार, रिर्काडिस्ट और गीतकार मुंबई के फ़िल्मी आकाश पर तारों की लड़ी की तरह जगमगा रहे थे। गीतकारी तुकबंदी से आगे बढ़कर कविता की सुंदरता और अर्थ लिए हुए आगे बढ़ चली थी। नक़्श साहब के गीतों में भी उनसे पहले की पीढ़ी के और उनके युग के कुछ फ़िल्मी गीतकारों की तरह साहित्यिक कविता की उँचाई, प्रेम और श्रृंगार का सुहानापन और समाजी सूझबूझ के साथ परम्पराओं और नवीनता का संगम दिखाई देता है।


नक़्श साहब को जिन गीतों में ग़ज़ल का फ़ार्म अपनाने का अवसर मिला वहाँ उन्होंने अपने शेरी ज़ौक़ और रियाज़ के तहत ग़ज़ल के जादू जगाए हैं और जहाँ सिचुएशन और धुन ने नज़्म को अपनाना चाहा वहाँ उन्होंने उर्दू की रूमानी नज़्मों के अन्दाज़ में ख़ूबसूरती बिखेरी है। ग़ज़ल के कुछ खूबसूरत शेर यूँ हैं-

पाकीज़गी जमाल की कैसे करें बयाँ
निस्बत है हुस्ने-यार को हुस्ने-बयाँ से क्या
तेरे ख़्याल का शीशा न टूट जाए कहीं
इसी ख़्याल में हर शब गुज़ार दी हमने

ख़ुद से दूर हो गए तुम से दूर होके हम
चैन की तलाश थी दर्द में सिमट गए


और दूसरी लाइन में एक रुक्न की जानबूझकर कमी को निभाते हुए ये अशआर-


तुमको देखा तो निगाहों ने मेरी देख लिया
मौसम-ए-गुल का समाँ, नग़म-ए-जाँ
लब हैं ख़ामोश मगर सारा बदन बात करे
ख़ूब है तर्ज-ए-बयां, नग़म-ए-जाँ


नौशाद साहब की धुन में ढली और हरिहरन की आवाज़ में खिली बाद की फ़िल्म ‘ताजमहल’ के लिए कही गई ख़ालिस रूमानी नज़्म के दो बंद देखें-

मुमताज़ तुझे देखा जब ताजमहल देखा
फिर आज की आँखों से गुज़रा हुआ कल देखा

ये हँसती हुई आँखें लहराते हुए गेसू
नग़मा तेरी ख़ामोशी, आवाज़ तेरी जादू
मैनें तेरी बातों में अन्दाज़-ए-ग़ज़ल देखा

जब लेके तू अँगडाई कुछ और क़रीब आई
दामन में मुहब्बत के सिमटी मेरी तनहाई
इक नूर की बारिश में भीगा हुआ पल देखा


और इससे अलग फ़िल्म ‘घरौंदा’ में शामिल इस नज़्म का बन्द भी देखिए जिस में आज के युग के नए इश्क़ की तड़प दिखाई पड़ती है-


मगर फिर भी रहते हो तुम दूर मुझसे
तो रहते है दिल पर उदासी के साए
कोई ख़्वाब ऊँचे मकानों से झाँके
कोई ख़्वाब बैठा रहे सर झुकाए

कभी दिल की राहों में फैले अँधेरा
कभी दूर तक रोशनी मुस्कराए
मुझे फिर भी इस बात का तो यक़ीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं हैं नहीं है


फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन मुम्बई के एक मुशायरे में मरहूम शायर गणेश बिहारी तर्ज़, मरहूम शायर क़मर जलालाबादी, शायर नक़्श लायलपुरी और शायर-संचालक देवमणि पांडेय (मुम्बई 2000)


साहिर लुधियानवी की फ़िल्मी नग़मा निगारी के बारे में जाँ निसार अख़्तर ने अपने एक लेख में लिखा है कि फ़िल्म ‘जाल’ के गीत ‘सुन जा दिल की दास्ताँ’ के लिए जो धुन साहिर को दी गई होगी वो अगर किसी मामूली शायर को दी गई होती तो वो उस धुन पर आसानी से ‘आजा आजा बालमा’ लिख देता। ‘सुन जा दिल की दास्ताँ और ‘आजा आजा बालमा’ का अन्तर शायरी और तुकबन्दी का अन्तर है।


कभी कभी बनी बनाई धुन पर लिखते वक़्त शायर को सही शब्द से अधिक इस बात को तरजीह देनी होती है कि सुनने- सुनाने में वो शब्द कैसा लगता है। नक़्श साहब के सामने भी ऐसी कई मुश्किल घड़ियाँ आई होंगी मगर क़द्र इस बात की करनी होगी कि उन्होंने ऐसे समय पर समझौते नहीं किए। कई गीत जो ग़ज़ल या नज़्म के अन्दाज में नहीं बल्कि ख़ालिस गीत की तकनीक में लिखे गए हैं उनमें भी उन्होंने जहाँ तक मुमकिन हुआ मीटर को आगे पीछे करके, कमी करके, कभी बढ़ा कर पूरी तरह बहर को निभाया है और बरक़रार रखा है। हिंदी गीतों में जहाँ उन्होंने खड़ी बोली के दिलकश शब्दों का प्रयोग किया है वहाँ हिंदी छन्द की मात्राओं का भी ध्यान रखा है। दी हुई धुनों पर शब्दों को भर कर संतुष्ट होने के बजाय उन्होंने सीमा में रहते हुए फैलाव में सुन्दर और अर्थ लिए भाव समोने की पूरी कोशिश की है, जैसे एक अलबम के लिए लिखे हुई भूपेंद्र की आवाज़ और उनके ही संगीत से सजे गीत के इस अन्तरे की बहर और तरतीब (सिलसिला) पर ध्यान दीजिए –

आज मेरे आँसू न पोछों, अपने हाल पे रो लेने दो,
मुझ आवारा पागल को
कैसे गले लगा लोगे तुम, कितनी देर सँभालोगे तुम,
मय की ख़ाली बोतल को
ठोकर मारो, मुझे गिरा दो, तुम एहसास के ज़ीने से
बेहोशी में मरना अच्छा, होश में आकर जीने से


इसी तरह फ़िल्म ‘तुम्हारे लिए’ के एक गीत का आख़िरी अन्तरा भी तरक़ीब और तकनीक के हिसाब से हमें अपनी ओर खींचता है-

मुरलिया समझकर मुझे तुम उठालो
बस इक बार होंठो से अपने लगालो
कोई सुर तो जागे मेरी धड़कनों में
कि मैं अपनी सरगम से रुठी हुई


किसी भी युग की शायरी चाहे वो इलमी हो या फ़िल्मी, यदि अपने युग की समाजी, राजनैतिक सच्चाइयों से कटी रहे तो उसका हक़ अदा नहीं होता। हर वास्तविक शायर के यहाँ किसी न किसी पहलू से अपने युग के सामाजिक सरोकार अवश्य मिलते हैं। फ़िल्म ‘शहीद भगत सिंह’ (ऐ वतन) के लिए जयदेव कुमार के संगीतबद्ध किए और कोरस में जोश के साथ गाए हुए नक्श लायलपुरी के इस जोशीले गीत ‘माए रंग दे बसंती चोला’ को भला कौन भुला सकता है ! देश भक्ति और देश के लिए जीवन का बलिदान करने वाले तरानों में इसकी अपनी एक जगह है-

भारत माँ के पैरों में ज़ंजीर न देखी जाएगी
सोचूं देख के कौम पर अपनी अत्याचार पराए
जाने दूध का क़र्ज़ चुकाने का मौसम कब आए
मेरे ख़ून में देश प्रेम का रंग है तूने घोला
माए रंग दे बसंती चोला
मेरा रंग दे बसंती चोला


एक विषय को लेकर लिखी गई शायरी की बात हो तो टी वी सीरियल ‘क़ानून को बदल डालो’ में फ़िल्माई गई ये नज़्म भी दाद चाहती है जिसका एक बन्द ये है-

हर निर्धन को पेट की आग में जलते देखा
दुनिया में पैसे का पाप ही पलते देखा
पैसा क़ातिल,पैसा ही देता है सज़ाएँ
पैसे का क़ानून जहाँ में चलते देखा
ऐ क़ानून के रखवालो
ये क़ानून बदल
डालो


नक़्श साहब की फ़िल्मी गीतकारी के लम्बे सफ़र के चुने हुए मोड़ और पड़ाव इस छोटी सी शायरी की पुस्तक ‘आँगन-आँगन बरसे गीत’ के रुप में आपके सामने पेश हैं। इनमें से ज्य़ादा गानों के मुखड़ों की गूँज आप के कानों में समाई है। अब काग़ज पर इन्हें पढ़ना आपको और आनंदमय लगेगा क्योंकि ये गीत आप का दिल बहलाने का सामान करने के साथ-साथ आपके साहित्यिक और शायराना ज़ौक़ (Teste) की तसकीन (आराम) का इन्तज़ाम भी करते

(इस पोस्ट के लेखक जनाब अब्दुल अहद साज़ (मुम्बई) जाने-माने शायर हैं)