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Friday, July 1, 2011

ये मुलाकात इक बहाना है




नक़्श लायलपुरी के फिल्मी गीतों की साहित्यिक क़ीमत



ये मुलाकात इक बहाना है
प्यार का सिलसिला पुराना है


नक़्श लायलपुरी साहब के नाम से हमारे कान उस वक़्त से आशना हैं जब हम नौजवानी के ज़माने में रात की तन्हाई में रेडियो सीलोन सुना करते थे और उदघोषक की आवाज़ आती थी कि अब जो गीत आप सुनेंगे वो आशा भोसले और मु.रफ़ी की आवाज़ में फ़िल्म ‘अल्लादीन ऍन्ड दी वन्डरफुल लैम्प’ का है। संगीतकार हैं चित्रगुप्त और गीत के बोल लिखे हैं नक़्श लायलपुरी ने।



उस दौर को याद करते हुए अब ये बात कितनी गर्व की लगती है कि नक़्श साहब अपनी साहित्यिक और फ़िल्मी गीतकारी की आधी सदी से ज़्यादा की यात्रा पूरी कर चुकने के बाद माशाअल्लाह आज भी मानसिक रुप से जागरूक और सक्रिय हैं। उनका क़लम काग़ज़ पर और सिल्यूलाईड के फ़ीते पर आज भी चल रहा हैं। एक तरफ़ उनके पुराने गीतों को नौशाद, ख़य्याम, मदनमोहन और जयदेव जैसे उस्ताद संगीतकारों ने अपने सुरों से सजाया है और मु.रफ़ी, तलतमहमूद,लता मंगेशकर, आशा भोसले जैसे महान गायकों ने अपनी आवाज़ों में रचाया है। दूसरी तरफ़ इन दिनों फ़िल्मों और टी.वी सीरियलों के लिए आज के युग के संगीतकारों जैसे ललित सेन, सपन जगमोहन, कुलदीप सिंह आदि ने उनके नए गीतों को अपनी धुनों में उतारा है और आज के प्रसिद्ध गायकों जगजीत सिंह, उदित नारायण, हरिहरन,तलत अज़ीज़, कविता कृष्णमूर्ति और दूसरों ने अपनी आवाज़ों में रचाया है। पंकज उधास, भूपेंद्र, ग़ुलाम अली, अशोक खोसला आदि की आवाज़ में संगीतबद्ध किए हुए प्राइवेट अलबम भी इसमें जोड़ कर गिने जा सकते हैं।


नक़्श साहब ने हिंन्दुस्तानी फ़िल्म इंडस्ट्रीज का वो सुनहरा युग पाया है जब श्रेष्ठ श्रेणी के निर्देशक, कलाकार,संवाद लेखक, संगीतकार, रिर्काडिस्ट और गीतकार मुंबई के फ़िल्मी आकाश पर तारों की लड़ी की तरह जगमगा रहे थे। गीतकारी तुकबंदी से आगे बढ़कर कविता की सुंदरता और अर्थ लिए हुए आगे बढ़ चली थी। नक़्श साहब के गीतों में भी उनसे पहले की पीढ़ी के और उनके युग के कुछ फ़िल्मी गीतकारों की तरह साहित्यिक कविता की उँचाई, प्रेम और श्रृंगार का सुहानापन और समाजी सूझबूझ के साथ परम्पराओं और नवीनता का संगम दिखाई देता है।


नक़्श साहब को जिन गीतों में ग़ज़ल का फ़ार्म अपनाने का अवसर मिला वहाँ उन्होंने अपने शेरी ज़ौक़ और रियाज़ के तहत ग़ज़ल के जादू जगाए हैं और जहाँ सिचुएशन और धुन ने नज़्म को अपनाना चाहा वहाँ उन्होंने उर्दू की रूमानी नज़्मों के अन्दाज़ में ख़ूबसूरती बिखेरी है। ग़ज़ल के कुछ खूबसूरत शेर यूँ हैं-

पाकीज़गी जमाल की कैसे करें बयाँ
निस्बत है हुस्ने-यार को हुस्ने-बयाँ से क्या
तेरे ख़्याल का शीशा न टूट जाए कहीं
इसी ख़्याल में हर शब गुज़ार दी हमने

ख़ुद से दूर हो गए तुम से दूर होके हम
चैन की तलाश थी दर्द में सिमट गए


और दूसरी लाइन में एक रुक्न की जानबूझकर कमी को निभाते हुए ये अशआर-


तुमको देखा तो निगाहों ने मेरी देख लिया
मौसम-ए-गुल का समाँ, नग़म-ए-जाँ
लब हैं ख़ामोश मगर सारा बदन बात करे
ख़ूब है तर्ज-ए-बयां, नग़म-ए-जाँ


नौशाद साहब की धुन में ढली और हरिहरन की आवाज़ में खिली बाद की फ़िल्म ‘ताजमहल’ के लिए कही गई ख़ालिस रूमानी नज़्म के दो बंद देखें-

मुमताज़ तुझे देखा जब ताजमहल देखा
फिर आज की आँखों से गुज़रा हुआ कल देखा

ये हँसती हुई आँखें लहराते हुए गेसू
नग़मा तेरी ख़ामोशी, आवाज़ तेरी जादू
मैनें तेरी बातों में अन्दाज़-ए-ग़ज़ल देखा

जब लेके तू अँगडाई कुछ और क़रीब आई
दामन में मुहब्बत के सिमटी मेरी तनहाई
इक नूर की बारिश में भीगा हुआ पल देखा


और इससे अलग फ़िल्म ‘घरौंदा’ में शामिल इस नज़्म का बन्द भी देखिए जिस में आज के युग के नए इश्क़ की तड़प दिखाई पड़ती है-


मगर फिर भी रहते हो तुम दूर मुझसे
तो रहते है दिल पर उदासी के साए
कोई ख़्वाब ऊँचे मकानों से झाँके
कोई ख़्वाब बैठा रहे सर झुकाए

कभी दिल की राहों में फैले अँधेरा
कभी दूर तक रोशनी मुस्कराए
मुझे फिर भी इस बात का तो यक़ीं है
मुझे प्यार तुमसे नहीं हैं नहीं है


फ़िल्म राइटर्स एसोसिएशन मुम्बई के एक मुशायरे में मरहूम शायर गणेश बिहारी तर्ज़, मरहूम शायर क़मर जलालाबादी, शायर नक़्श लायलपुरी और शायर-संचालक देवमणि पांडेय (मुम्बई 2000)


साहिर लुधियानवी की फ़िल्मी नग़मा निगारी के बारे में जाँ निसार अख़्तर ने अपने एक लेख में लिखा है कि फ़िल्म ‘जाल’ के गीत ‘सुन जा दिल की दास्ताँ’ के लिए जो धुन साहिर को दी गई होगी वो अगर किसी मामूली शायर को दी गई होती तो वो उस धुन पर आसानी से ‘आजा आजा बालमा’ लिख देता। ‘सुन जा दिल की दास्ताँ और ‘आजा आजा बालमा’ का अन्तर शायरी और तुकबन्दी का अन्तर है।


कभी कभी बनी बनाई धुन पर लिखते वक़्त शायर को सही शब्द से अधिक इस बात को तरजीह देनी होती है कि सुनने- सुनाने में वो शब्द कैसा लगता है। नक़्श साहब के सामने भी ऐसी कई मुश्किल घड़ियाँ आई होंगी मगर क़द्र इस बात की करनी होगी कि उन्होंने ऐसे समय पर समझौते नहीं किए। कई गीत जो ग़ज़ल या नज़्म के अन्दाज में नहीं बल्कि ख़ालिस गीत की तकनीक में लिखे गए हैं उनमें भी उन्होंने जहाँ तक मुमकिन हुआ मीटर को आगे पीछे करके, कमी करके, कभी बढ़ा कर पूरी तरह बहर को निभाया है और बरक़रार रखा है। हिंदी गीतों में जहाँ उन्होंने खड़ी बोली के दिलकश शब्दों का प्रयोग किया है वहाँ हिंदी छन्द की मात्राओं का भी ध्यान रखा है। दी हुई धुनों पर शब्दों को भर कर संतुष्ट होने के बजाय उन्होंने सीमा में रहते हुए फैलाव में सुन्दर और अर्थ लिए भाव समोने की पूरी कोशिश की है, जैसे एक अलबम के लिए लिखे हुई भूपेंद्र की आवाज़ और उनके ही संगीत से सजे गीत के इस अन्तरे की बहर और तरतीब (सिलसिला) पर ध्यान दीजिए –

आज मेरे आँसू न पोछों, अपने हाल पे रो लेने दो,
मुझ आवारा पागल को
कैसे गले लगा लोगे तुम, कितनी देर सँभालोगे तुम,
मय की ख़ाली बोतल को
ठोकर मारो, मुझे गिरा दो, तुम एहसास के ज़ीने से
बेहोशी में मरना अच्छा, होश में आकर जीने से


इसी तरह फ़िल्म ‘तुम्हारे लिए’ के एक गीत का आख़िरी अन्तरा भी तरक़ीब और तकनीक के हिसाब से हमें अपनी ओर खींचता है-

मुरलिया समझकर मुझे तुम उठालो
बस इक बार होंठो से अपने लगालो
कोई सुर तो जागे मेरी धड़कनों में
कि मैं अपनी सरगम से रुठी हुई


किसी भी युग की शायरी चाहे वो इलमी हो या फ़िल्मी, यदि अपने युग की समाजी, राजनैतिक सच्चाइयों से कटी रहे तो उसका हक़ अदा नहीं होता। हर वास्तविक शायर के यहाँ किसी न किसी पहलू से अपने युग के सामाजिक सरोकार अवश्य मिलते हैं। फ़िल्म ‘शहीद भगत सिंह’ (ऐ वतन) के लिए जयदेव कुमार के संगीतबद्ध किए और कोरस में जोश के साथ गाए हुए नक्श लायलपुरी के इस जोशीले गीत ‘माए रंग दे बसंती चोला’ को भला कौन भुला सकता है ! देश भक्ति और देश के लिए जीवन का बलिदान करने वाले तरानों में इसकी अपनी एक जगह है-

भारत माँ के पैरों में ज़ंजीर न देखी जाएगी
सोचूं देख के कौम पर अपनी अत्याचार पराए
जाने दूध का क़र्ज़ चुकाने का मौसम कब आए
मेरे ख़ून में देश प्रेम का रंग है तूने घोला
माए रंग दे बसंती चोला
मेरा रंग दे बसंती चोला


एक विषय को लेकर लिखी गई शायरी की बात हो तो टी वी सीरियल ‘क़ानून को बदल डालो’ में फ़िल्माई गई ये नज़्म भी दाद चाहती है जिसका एक बन्द ये है-

हर निर्धन को पेट की आग में जलते देखा
दुनिया में पैसे का पाप ही पलते देखा
पैसा क़ातिल,पैसा ही देता है सज़ाएँ
पैसे का क़ानून जहाँ में चलते देखा
ऐ क़ानून के रखवालो
ये क़ानून बदल
डालो


नक़्श साहब की फ़िल्मी गीतकारी के लम्बे सफ़र के चुने हुए मोड़ और पड़ाव इस छोटी सी शायरी की पुस्तक ‘आँगन-आँगन बरसे गीत’ के रुप में आपके सामने पेश हैं। इनमें से ज्य़ादा गानों के मुखड़ों की गूँज आप के कानों में समाई है। अब काग़ज पर इन्हें पढ़ना आपको और आनंदमय लगेगा क्योंकि ये गीत आप का दिल बहलाने का सामान करने के साथ-साथ आपके साहित्यिक और शायराना ज़ौक़ (Teste) की तसकीन (आराम) का इन्तज़ाम भी करते

(इस पोस्ट के लेखक जनाब अब्दुल अहद साज़ (मुम्बई) जाने-माने शायर हैं)

2 comments:

नीरज गोस्वामी said...

नक्श साहब की अजीम शख्शियत और दिलकश शायरी के बारे में पढ़ कर बहुत अच्छा लगा. उनकी जानकारी हम तक पहुँचाने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया.

नीरज

तिलक राज कपूर said...

नक्‍श साहब तो उस ज़माने की मिसाल हैं जब फि़ल्‍मी गीत पूरी गंभीरता से कहे जाते थे, उसी गंभीरता से उनपर संगीत चढ़ाया जाता था और उसी गहराई से उन्‍हें गाया जाता था। हिन्‍दी में रुचि लेने वाली आज की पीढ़ी भी उस समय के फिल्‍मी गीतों का उसी तरह रसास्‍वादन करती है जैसे उस ज़माने में किया जाता था; अलबत्‍ता इंग्लिश गाने के आज के शौकीनों की बात और है।

आज भी दूर कहीं नक्‍श साहब का कोई गीत बज रहा हो तो कान ठहर जाते हैं।