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Friday, July 8, 2011

बारिश के सुहाने मौसम में

गायक राजकुमार रिज़वी कवि देवमणि पांडेय और शायर ज़फ़र गोरखपुरी


कल रात्त सही मायनों में मुम्बई में मौसम की पहली बारिश हुई। रात भर बारिश की पाजेब से छम-छम की आवाज़ें आ रहीं थीं। आज सुबह खिड़की से बाहर झाँका तो इमारतों के धुले हुए चेहरे बहुत सुंदर लग रहे थे। मेरे परिसर के पेड़ों पर जमी हुई धूल और धुँए की परत साफ़ हो गई थी। तन पर हरियाली की शाल ओढ़े हुए दरख़्त मस्ती में झूम रहे थे। दो-तीन फीट पानी में डूबी हुई सड़क के सीने पर तेज़ रफ़्तार में जैसे झरना बह रहा था। सामने की खिड़कियों में फूल जैसे चेहरे मुस्करा रहे थे। पानी को चीरकर आगे बढ़ती हुईं गाड़ियाँ मन में उल्लास जगा रहीं थीं। कॉलोनी के पार्क में गुलमोहर के पेड़ों के नीचे सुर्ख़ फूलों की चादर बिछी हुई है। परवीन शाकिर का शेर याद आ गया-


बारिश हुई तो फूलों के तन चाक हो गए
मौसम के हाथ भीगकर शफ्फ़ाक हो गए


बारिश के ऐसे सुहाने मौसम में मेरे एक गीत का लुत्फ़ उठाइए साथ में शायर ज़फ़र गोरखपुरी की एक दिलकश ग़ज़ल भी पेशे-ख़िदमत है।


देवमणि पांडेय का गीत

खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
होती है सभी से भूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।

यह चाँद पुराना आशिक़ है
दिखता है कभी छिप जाता है
छेड़े है कभी ये बिजुरी को
बदरी से कभी बतियाता है

यह इश्क़ नहीं है फ़िज़ूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।

बादल की सुनी जब सरगोशी
बहके हैं क़दम पुरवाई के
बूंदों ने छुआ जब शाख़ों को
झोंके महके अमराई के

टूटे हैं सभी के उसूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।

यादों का मिला जब सिरहाना
बोझिल पलकों के साए हैं
मीठी सी हवा ने दस्तक दी
सजनी कॊ लगा वॊ आए हैं

चुभते हैं जिया में शूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।
खिलते हैं दिलों में फूल सनम बारिश के सुहाने मौसम में।



कवि देवमणि पांडेय और चित्रकार अवधेश मिश्र


ज़फ़र गोरखपुरी की ग़ज़ल

जिस्म छूती है जब आ आ के पवन बारिश में
और बढ़ जाती है कुछ दिल की जलन बारिश में

मेरे अतराफ़ छ्लक पड़ती हैं मीठी झीलें
जब नहाता है कोई सीमबदन बारिश में

दूध में जैसे कोई अब्र का टुकड़ा घुल जाए
ऐसा लगता है तेरा सांवलापन बारिश में

नद्दियां सारी लबालब थीं मगर पहरा था
रह गए प्यासे मुरादों के हिरन बारिश में

अब तो रोके न रुके आंख का सैलाब सखी
जी को आशा थी कि आएंगे सजन बारिश में

3 comments:

नीरज गोस्वामी said...

दो बेजोड़ रचनाकार...दो बेजोड़ रचनाएं...वाह...बारिश के मौसम का ये बेहतरीन तोहफा दिया है आपने ...शुक्रिया...

नीरज

दिगम्बर नासवा said...

भीगते फूलों और पत्तों के बीच सुहाने मौसम की कल्पना .... समां बाँध दिया इन लाजवाब गज़ल और गीत ने ...

सुनील गज्जाणी said...

प्रणाम !
दोनों ही लाज़वाब गीत है , आप को और ज़फर साब कि कलाम को शत शत नमन !
सादर