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Tuesday, November 23, 2010

माशूक के रुतबे को महशर में कोई देखे

सूफी अलबम कबीराना सूफियाना के लोकार्पण समारोह में- एक्सेल इंफोज लि.के एमडी लखमेंद्र खुराना, संगीतकार-गायक विवेक प्रकाश, संगीतकार ख़य्याम, सूफी सिंगर कविता सेठ, कवि नारायण अग्रवाल, कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय और टाइम्स म्यूज़िक के पूर्व सीईओ अरुण अरोड़ा।

सूफी संत, विश्व शांति एवं वसुधैव कुटुम्बकम
दुनिया को सूफीवाद की सबसे बड़ी देन है मुहब्बत। सूफ़ी शायरों ने पूरी दुनिया को मुहब्बत का पैगाम दिया। सूफी शायरों ने अपने सूफ़ियाना कलामों के ज़रिए लोगों को मुहब्बत का ऐसा ख़ूबसूरत पैग़ाम दिया कि दिल के तारों में झनकार पैदा हो गई। लोगों ने ख़ुदा के साथ अपना ऐसा पाक और रुहानी रिश्ता जोड़ा कि उन्हें अपने दिल के आईने में सारी दुनिया का अक्स नज़र आने लगा। इस तरह दिल से दिल के तार जुड़ते चले गए।

हमारे देश के संत कवियों ने भी जात-पांत, धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर, प्रेम के धागे से लोगों के दिलों को जोड़ने का काम बहुत ख़बसूरती से किया। दरअसल हमारे ऋषियों और संतों ने वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को पूरी दुनिया में पहुँचाने का नेक काम हमेशा किया। शायद इसी लिए इस्लाम के सूफीमत और हिंदुस्तान की संतवाणी दोनों का तसव्वुर एक ही है। दोनों मज़हब में नहीं बंटे। यूनीवर्सल बने रहे। दोनों ने अपना रिश्ता अल्लाह से और ईश्वर से जोड़ा। सभी को एक जैसा मानने वाले इन सूफियों और संतों ने सभी इंसानों के लिए प्यार का पैग़ाम दिया।

सूफीवाद की ख़ुशबू पंजाब की संतवाणी में भी नुमायां है। गुरुनानक से लेकर बुल्ले शाह, वारिसशाह और बाबा फरीद ने अपनी सूफी कलाम से मुहब्बत की ऐसी बारिश की जिसमें समूचा हिंदुस्तान तरबतर हो गया-

अव्वल अल्ला नूर उपाया, क़ुदरत दे सब वंदे।
एक नूर ते सब जग उपज्यां , कौन भले कौन मंदे।

क़रीब हज़ार साल पहले ईरान में इमाम ग़ज़ाली के ज़रिए सूफीवाद का उदय हुआ। वहां से तुर्की होते हुए इसकी ख़ुशबू हिंदुस्तान पर छा गई। ईरान के सूफी संतों, ख़ास तौर से जलालुद्दीन रुमी और हाफ़िज़ शीराजी ने सूफीवाद को अपने कलाम के ज़रिए बुलंदी पर पहुंचाया। आज भी लोग उनसे इतनी मुहब्बत करते हैं कि वर्ष 2007 को पूरी दुनिया में इयर ऑफ दि रुमी के तौर पर मनाया गया। यह उनकी 800वीं बरसी थी।

हिंदुस्तान में निज़ामुद्दीन औलिया के शागिर्द अमीर ख़ुसरो के कलाम में सूफीवाद का ख़ूबसूरत मंज़र दिखाई देता है। ख़ुदा से मेल होने के बाद आदमी अपनी दुनियावी पहचान से आज़ाद होकर एक अलौकिक दुनिया में पहुंच जाता है। अमीर खुसरो लिखते हैं- छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइ के सूफीवाद की रिवायत के अनुसार उनकी रचनाओं में फीमेल लहजा भी दिखाई देता है । उन्होंने लिखा-

ख़ुसरो रैन सुहाग की जागी पिय के संग।
तन मेरा मन मेरा पीव का दोनों भए एक संग।

सूफीवाद पर चर्चा करते हुए कवि-उदघोषक देवमणि पाण्डेय, सूफी सिंगर कविता सेठ और कवि नारायण अग्रवाल।

सूफीवाद मुहब्बत के दयार में फ़कीर की तरह घूमने-फिरने की आज़ादी है। यह माना जाता है कि अल्लाह हर चीज़ में है। अगर अल्लाह हर चीज़ में है तो वह बुत में भी है। सूफी शायर लिखता है-

बुत में भी तेरा यारब जलवा नज़र आता है
बुतख़ाने के परदे में काबा नज़र आता है

माशूक के रुतबे को महशर में कोई देखे
अल्लाह भी मजनूं को लैला नज़र आता है

इक क़तरा-ए-मय जब से साक़ी ने पिलाई है
उस रोज़ से हर क़तरा दरिया नज़र आता है

साक़ी की मोहब्बत में दिल साफ़ हुआ इतना
जब सर को झुकाता हूं शीशा नज़र आता है

दिल और कहीं ले चल ये दैरो-हरम छूटे
इन दोनों मकानों में झगड़ा नज़र आता है


सूफीवाद कहता है कि अल्लाह एक है। उसके बंदे एक हैं। अल्लाह को पाने के लिए जोगी बनना ज़रूरी नहीं है। घर-गृहस्थी में रहकर भी अल्लाह से रिश्ता जोड़ा जा सकता है। बीवी से प्रेम है तो अल्लाह से भी मुहब्बत हो सकती है। ख़ुदा से मुहब्बत यानी परमात्मा से आत्मा का मिलन ही इनकी ज़िंदगी का मक़सद था।

नूर मोहम्मद यह कथा है तो प्रेम की बात।
जेहि मन कोई प्रेम रस पढ़े सोई दिन रात।


हिंदुस्तान में मलिक मोहम्मद जायसी,कुतुबन,मंझन,नूर मुहम्मद आदि कई ऐसे रचनाकार हुए जिन्हें सूफी रिवायत का आगे बढ़ाने वाला माना जाता है। जायसी ने पदमावत, अखरावट, और कान्हावत जैसे महाकाव्य लिखे। आशिक़ में तड़प,क़सक और दर्द का होना ज़रुरी है। जायसी के पदमावत में इन भावनाओं की बुलंदी दिखाई देती है। इस प्रेम कथा में रानी पदमावती को परमात्मा और राजा रत्नसेन को आत्मा के रुप में चित्रित किया गया है। ख़ास बात यह है कि हिंदुस्तान के सूफी शायरों ने अपने सूफियाना कलाम के लिए सारे अफ़साने हिंदू मैथॉलाजी से लिए। भारत के सूफी शायर यहां के लोक जीवन, लोकाचार और लोक संस्कृति से भली भांति वाक़िफ़ थे। महबूब की जुदाई के इज़हार के लिए जायसी ने बारहमासा लिखा जो लोक जीवन की मंज़रकशी का बेजोड़ नमूना है।

सूफी शायरों ने अपने पराए के दायरे से बाहर निकालकर पूरी दुनिया की भलाई के लिए इंसानियत पर ज़ोर दिया। सूफियों में जोड़ने की ज़बरदस्त भावना थी। उन्होंने किसी भी भेदभाव से ऊपर उठकर इंसान के दिलों को जोड़ने का काम हमेशा किया।

सूफियों के अनुसार प्रेम ही जीवन की सबसे बड़ा सचाई है। जो इंसान इस प्रेम को पा लेता है उसे किसी और चीज़ की ज़रुरत नहीं रह जाती। कबीर ने लिखा है-

कबिरा प्याला प्रेम का अंतर लिया लगाया।
रोम रोम में रमि रहा और अमल कोड नाय।


रामानंद के शिष्य कबीर को कुछ लोग सूफी संत शेख़ तकी का शागिर्द भी बताते हैं। कबीर पर सूफियों का काफी असर दिखाई देता है- कबीर ने कहा है-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय।

शायरी की रिवायत में महबूब मेल है। इसलिए ऐसी शायरी काफी लिखी गई है जिसमें दोहरे संकेत हैं। यानी चाहे उसे ख़ुदा के लिए समझिए या महबूब के लिए। यह सिलसिला आज भी जारी है। शायर देवमणि पाण्डेय की ग़ज़ल देखिए-

ख़यालों में तुम्हारे जब कभी मैं डूब जाता हूं
जिधर देखूं नज़र के सामने तुमको ही पाता हूं

मुहब्बत दो दिलों में फ़ासला रहने नहीं देती
मैं तुमसे दूर रहकर भी तुम्हें नज़दीक पाता हूं

किसी लम्हा, किसी भी पल ये दिल तनहा नहीं होता
तेरी यादों के फूलों से मैं तनहाई सजाता हूं

तेरी चाहत का जादू चल गया है इस तरह मुझ पर
ख़ुशी में रक्स करता हूं, मैं ग़म में मुसकराता हूं

मेरे दिल पर, मेरे एहसास पर यूं छा गए हो तुम
तुम्हें जब याद करता हूं मैं सब कुछ भूल जाता हूं

सूफी लोग सूफ यानी ऊन का लबादा पहनते थे। सूफी का मक़सद है फ़कीर होना। सादगी ही इनका धर्म है। धन- दौलत से इन्हें कुछ मतलब नहीं।

हर रिश्ते से ले लिया, जबसे हमने जोग ।
घर के से लगने लगे, दुनिया भर के लोग।


पूरी दुनिया को अपना घर-परिवार समझने वाले सूफी शायरों और सूफी संतों ने मुहब्बत की एक ऐसी मशाल रोशन की जिसकी रोशनी में आज भी पूरी दुनिया को अपना रास्ता साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है।

4 comments:

नीलम शर्मा अंशु said...

बहुत ही सुंदर। आनंद आ गया।

pran said...

SUFI SHAYRON AUR KAVIYON PAR AAPKA
LEKH ACHCHHA LAGAA HAI . BABA
SHAIKH FARID , BULLE SHAH ,WARIS
SHAH AADI KEE RACHNA PANJABI KAVYA SAHITYA KEE ATMA HAI . IN KAVIYON
KEE VANI PANJAB KE GHAR - GHAR MEIN
PAHUNCHEE .
AAPKEE GAZAL MEIN BHEE
SUFI SWAR HAI . ZAROORAT HAI HINDI
MEIN AESEE GAZALON KEE . PREET GAZAL KEE ROOH HAI .

Vijay Kumar Sappatti said...

waah waah
devmani ji aaj to aapne mera manpasand vishay par likha hai. subah office me aakar bas aapki hi post padh raha hoon . bahut hi sundar. man sufi ho gaya , tan sufi ho gaya ... mujhe sufi nazme bahut pasand hai aur yakinan sufi sangeet aatma ko sukh deta hai


aapka bahut bahut aabhaar.. is lekh ke liye ..

aapka

vijay
poemsofvijay.blogspot.com

sumita said...

सुन्दर प्रस्तुति के लिए आभार !