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Wednesday, June 9, 2010

जीवंती फाउंडेशन मुम्बई का मुशायरा

जीवंती फाउंडेशन के मुशायरे में-(बाएं से दाएं) : माया गोविन्द, देवमणि पाण्डेय, अब्दुल अहद साज़, ज़फ़र गोरखपुरी, हैदर नजमी, सईद राही , नक़्श लायल पुरी और हसन कमाल

जीवंती फाउंडेशन, मुम्बई ने भवंस कल्चरल सेंटर, अंधेरी के सहयोग से शनिवार 5 जून को एस.पी.जैन सभागार में शायर हसन कमाल को ‘जीवंती गौरव सम्मान’ से सम्मानित किया। सम्मानस्वरूप वरिष्ठ पत्रकार नंदकिशोर नौटियाल ने उन्हें प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिन्ह भेंट किया। समारोह संचालक आलोक भट्टाचार्य ने शायर हसन कमाल का ऐसा आला तवारूफ़ कराया कि उसे सुनकर सामईन परेशान और शायर पशेमान हो गया। जवाबी कार्रवाई हुए शायर हसन कमाल ने कहा- एक पल को मुझे लगा कि कहीं मैं अल्लाह को प्यारा तो नहीं हो गया…क्योंकि ज़िंदा आदमी की इतनी तारीफ़ तो कोई नहीं करता। बहरहाल इतना बता दें कि साप्ताहिक उर्दू ब्लिट्ज़ के पूर्व सम्पादक होने के साथ ही शायर हसन कमाल इन दिनों उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ के सम्पादक हैं। ग़ालिब अवार्ड से सम्मानित लखनऊ के मूल निवासी इस शायर ने कई फ़िल्मों के गीत भी लिखे जिनमें ‘निकाह’, ‘तवायफ़’, ‘आज की आवाज़’ आदि फ़िल्मों के गीत काफ़ी लोकप्रिय हुए। बी.आर.चोपड़ा के कई धारावाहिकों की पटकथा में भी उनका अच्छा योगदान रहा।

संस्था अध्यक्ष श्रीमती माया गोविंद के स्वागत वक्तव्य के बाद वरिष्ठ शायर नक़्श लायलपुरी की सदारत में मुशायरा का आयोजन हुआ। मुशायरे का आग़ाज़ करने आए शायर सईद राही ने असरदार तरन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर रंग जमाया-


अब कहाँ ख़त का आना जाना है / ये तो आवाज़ का ज़माना है
लोग उड़ते हैं आसमानों में / घर पे होना तो इक बहाना है

अपने सूफ़ियाना अलबम ‘रूबरू’ से चर्चित हुए युवा शायर हैदर नजमी ने भी तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़कर दाद वसूल की-

कभी यूँ भी मेरे क़रीब आ मेरा इश्क़ मुझको ख़ुदा लगे
मेरी रूह में तू उतर ज़रा कि मुझे कुछ अपना पता लगे
न तू फूल है न तू चाँद है न तू रंग है न तू आईना
तुझे कैसे कोई मैं नाम दूँ तू ज़माने भर से जुदा लगे

जीवंती गौरव सम्मान में-(बाएं से दाएं) : अब्दुल अहद साज़, राम गोविन्द, माया गोविन्द, ज़फ़र गोरखपुरी, हसन कमाल, नंदकिशोर नौटियाल, नक़्श लायलपुरी, देवमणि पाण्डेय और सईद राही

शायर देवमणि पांडेय ने अपने ख़ास अंदाज़ में ग़ज़ल सुनाई जो सामईन को काफ़ी को पसंद आई-

इश्क़ जब करिए किसी से दिल में ये जज़्बा भी हो
लाख हों रुसवाइयाँ पर आशिक़ी बाक़ी रहे
दिल में मेरे पल रही है यह तमन्ना आज भी
इक समंदर पी चुकूँ और तिश्नगी बाक़ी रहे


मुशायरे के नाज़िम अब्दुल अहद साज़ ने रोमांटिक ग़ज़ल सुनाकर मोहब्बत की ख़ुशबू बिखेरी-

इस तरह जाए न मुझसे रूठकर कहना उसे
घेर लेगी राह में मेरी नज़र कहना उसे
मैं हूँ उसके ग़म की दुनिया वो मेरी दुनिया का ग़म
जी न पाएगा वो मुझको छोड़कर कहना उसे


कई फ़िल्मों और धारावाहिकों के पटकथा-संवाद लेखन से जुड़े वरिष्ठ फ़िल्म लेखक राम गोविंद यहाँ शायर राम अतहर के रूप में सामने आए और कामयाब हुए-

कारनामे दूसरे के सर रहे / हम तो यारो नींव के पत्थर रहे
हम लिखा लाए परिंदों का नसीब / उम्र भर घर में रहे बेघर रहे


मुहावरे की भाषा में कहें तो वरिष्ठ शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने अपनी बेहतरीन शायरी से मुशायरा लूट लिया। उनकी ग़ज़ल का तेवर देखिए-

मर के जी उट्ठूँ किसी दिन सनसनी तारी करूँ
तेरी आँखों के हवाले से ख़बर जारी करूँ
वो कभी मिल जाए मुझको अपनी साँसों के क़रीब
होंठ भी हिलने न दूँ और गुफ़्तगू सारी करूँ

और इस शेर पर तो हंगामा बरपा हो गया-

इत्तिफ़ाकन बेवक़ूफ़ों के क़बीले में ज़फ़र
मैं ही एक चालाक हूँ फिर क्यों न सरदारी करूँ


श्रीमती माया गोविंद ने तरन्नुम में वो ग़ज़ल पढ़ी जो उन्होंने सोलह साल की उम्र में लाल क़िले पर सुनाई थी। श्रोताओं की फ़रमाइश पर ब्रजभाषा के कुछ रसीले छंद सुनाकर उन्होंने अपना असली रंग जमा दिया। शायर हसन कमाल ने अपनी एक चर्चित नज़्म सुनाई- ‘गर हो सके तो प्यार के दो बोल भेज दो / मुमकिन अगर हो गाँव का माहौल भेज दो’। फिर उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय ग़ज़ल सुनाकर समाँ बाँध दिया-

कल ख़्वाब में देखा सखी मैंने पिया का गाँव रे
काँटा वहाँ का फूल था और धूप जैसे छाँव रे
सबसे सरल भाषा वही सबसे मधुर बोली वही
बोलें जो नैना बावरे समझें जो सैंया सांवरे

सद्रे मुशायरा नक़्श लायलपुरी अपने धीमे लहजे में शेर सुनाकर सामईन के दिल में उतर गए-

चुभें आँख़ों में भी और रुह में भी दर्द की किरचें
मेरा दिल इस तरह तोड़ो के आईना बधाई दे
खनक उट्ठें न पलकों पर कहीं जलते हुए आँसू
तुम इतना याद मत आओ कि सन्नाटा दुहाई दे


और इस शेर ने तो सबको भिगो दिया-

रहेगा बन के बीनाई वो मुरझाई सी आँख़ों में
जो बूढ़े बाप के हाथों में मेहनत की कमाई दे


मुम्बई का भवंस कल्चरल सेंटर एक ऐसा मर्कज़ है जहाँ मुशायरा सुनने के लिए बा-ज़ौक़ सामईन तशरीफ़ लाते हैं। इस मुशायरे में भी वरिष्ठ फ़िल्म एवं नाट्य लेखक जावेद सिद्दीक़ी, वरिष्ठ रंगकर्मी ललित शाह, शास्त्रीय गायिका सोमा घोष, ग़ज़ल गायिका सीमा सहगल, संगीतज्ञ ललित वर्मा, अभिनेता राजेंद्र गुप्ता, अभिनेता विष्णु शर्मा, कवि डॉ.बोधिसत्व, कवि कुमार शैलेंद्र, शायर हस्तीमल हस्ती, शायर खन्ना मुजफ़्फ़रपुरी, शायरा देवी नागरानी , कवयित्री आभा बोधिसत्व, कथाकार संतोष श्रीवास्तव, प्रमिला वर्मा, सम्पादक राजम नटराजन पिल्लै, सम्पादक अनंत कुमार साहू, हिंदी सेवी डॉ.रत्ना झा और सरोजिनी जैन आदि मौजूद थे। अंत में व्यंग्यकार अनंत श्रीमाली ने आभार व्यक्त किया।

5 comments:

नीरज गोस्वामी said...

देवमणि जी ऐसे शानदार कार्यक्रम की हमें भनक भी नहीं लगने दी और सारा मज़ा खुद ही लूट ले गए...आप तो ऐसे ना थे...जिस दिलचस्प अंदाज़ में आपने इस मुशायरे का जिक्र किया है उसे पढ़ कर वहां मोजूद ना रह पाने का मलाल कई गुना बढ़ गया है...थोडा सा करम हम पे भी फरमा दिए करें तो हम भी ऐसे बेजोड़ शायरों को देख सुन अपना जीवन धन्य करलें...
नीरज

सुलभ § Sulabh said...

आहा ! पाण्डेय जी, क्या रंग जमा... खूब जमा...

हम तो इस पोस्ट प्रस्तुति से ही भीग गए. आपसे संवाद कायम रहे और क्या...

माधव said...

wah wah

अमिताभ मीत said...

क्या बात है ... शुक्रिया .... शुक्रिया ... कमाल के शेर पढवाए आप ने ...

devmanipandey said...

प्रिय देवमणी जी

मैं सुभाष शर्मा यह ईमेल आपको आस्ट्रेलिया से लिख रहा हूँ। आप की हिन्दी की गति विधियों के सम्बन्ध में मुझे जब तब ईमेल इधर उधर से मिलते रहते हैं। आपके प्रयासों से साहित्य लोगों तक पहुँच रहा है। हिन्दी उर्दू के महान हस्तियों को एक लिफ़ाफ़े में बंद कर आप जो हम सब तक निरंतर रूप से भेजते हैं वह बहुत ही सराहनीय कार्य है। लगे रहिये, चाहे माँ हो या मात्र भाषा हम सदा ही इनके ऋणी रहेगे। धन्य हैं वे जिन्हें इनकी सेवा करने का अवसर मिलता है। वरना हम जैसे बहुत से लोग विदेश में बैठ कर सिर्फ गाल बजा रहे हैं, और न इधर के हैं ना उधर के ही।

लीजिये जायका बदलने के लिए आपको अपनी पीड़ा अपनी कविता के माध्यम से पहुंचा दूं –

अपने ही देस में अपने ही लोगन के
दांव पेंच देखि हम विदेस भाजि आए है
भेद भाव धन आभाव देखि के मन मुटाव
हियाँ देखो आज हम चैन तनिक पाए है

पेट काटि बाप ने पाले थे पांच पूत
उन सबमें एक बस हम ही पढि पाए हैं
उन्हें छोड़ छाडि पाछे उनके ही हाल पे
दांव पाइ आज हम विदेस भाजि आए हैं

मान हानि ताक़ धरि अपनेंन को दूरि करि
धरती के दुसरे छोर पे हम आए हैं
पैसा ही पैसा पैसा की मार देखि
सगी माँ को दे तलाक सौतेली पाए हैं

कबहूँ अकुलात मन कबहूँ उकतात मन
कबहूँ हम अपने ही देस को गरियात हैं
कोंई अनजान जब माटी को देत लात
काहे छोडि आए हम जिया पछितात है

सुभाष शर्मा