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Tuesday, June 8, 2010

देवमणि पाण्डेय की पाँच ग़ज़लें

कवि देवमणि पाण्डेय का सम्मान करते हुए कवयित्री माया गोविंद

(पहली ग़ज़ल दिल्ली के ‘हंस’ (मासिक) के मई 2010 अंक में प्रकाशित हुई है। दूसरी गाज़ियाबाद की वार्षिक पत्रिका ‘वंशिका’ में शामिल है)


(1)

दुःख की लम्बी राहों में भी सुख की थोड़ी आस रहे
फिर ख़ुशियों के पल आएंगे दिल में ये एहसास रहे

इस दुनिया की भीड़ में इक दिन हर चेहरा खो जाता है
रखनी है पहचान तो अपना चेहरा अपने पास रहे

आदर्शों को ढोते-ढोते ख़ुद से दूर निकल आए
और अभी जाने कितने दिन देखो ये वनवास रहे

कहीं भी जाऊँ दिल का मौसम इक जैसा ही रहता है
यादों के दरपन में कोई चेहरा बारो-मास रहे

लफ़्ज़ अगर पत्थर हो जाएं रिश्ते टूट भी सकते हैं
बेहतर है लहजे में अपने फूलों जैसी बास रहे

(2)
खिली धूप में हूँ, उजालों में गुम हूँ
अभी मैं किसी के ख़्यालों में गुम हूँ

मेरे दौर में भी हैं चाहत के क़िस्से
मगर मैं पुरानी मिसालों में गुम हूँ

मेरे दोस्तों की मेहरबानियाँ हैं
कि मैं जो सियासत की चालों में गुम हूँ

कहाँ जाके ठहरेगी दुनिया हवस की
नए दौर के इन सवालों में गुम हूँ

मेरी फ़िक्र परवाज़ करके रहेगी
भले मैं किताबों, रिसालों में गुम हूँ

दिखाएं जो इक दिन सही राह सबको
मैं नेकी के ऐसे हवालों में गुम हूँ




देवमणि पाण्डेय : 98210-82126 
 devmanipandey@gmail.com

4 comments:

नीरज गोस्वामी said...

इस दुनिया की भीड़ में इक दिन हर चेहरा खो जाता है
रखनी है पहचान तो अपना चेहरा अपने पास रहे

पता नहीं चलता चाहत में
कैसे गुज़रा माघ महीना

मेरे दौर में भी हैं चाहत के क़िस्से
मगर मैं पुरानी मिसालों में गुम हूँ

आपका हाथ है हाथ में
ग़म के मौसम गुज़र जाएंगे

मोहब्बत का रिश्ता न टूटे कभी
कोई मिलके बिछड़े ख़ुदा ना करे


देवमणि जी सभी ग़ज़लें बेहतरीन हैं...लाजवाब हैं...मेरी बधाई स्वीकार करें.

नीरज

avnish uniyal said...

paanchon gazalain ek mala ke paanch motiyon si lagi

सुलभ § Sulabh said...

बेहतरीन! बेहतरीन!! बेहतरीन!!!

देवमणि जी सुनना बहुत ही खुशगवार होता है.

आचार्य जी said...

आईये जानें ....मानव धर्म क्या है।

आचार्य जी