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Friday, January 17, 2014

ख़ुशी का अपना रुतबा है कभी जो कम नहीं होता



रवि 2 फरवरी 2014 की शाम को रवींद्र नाट्य भवन इंदौर में संगीतकार राजेश रोशन  और मंच पर संचालक देवमणि पांडेय

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल-(1)



ख़ुशी का अपना रुतबा है कभी जो कम नहीं होता
मगर दुनिया में ग़म जैसा कोई हमदम नहीं होता

मैं अपनी दास्तां लेकर किसी के पास क्यूँ जाऊँ
कुछ ऐसे ज़ख़्म हैं जिनका कोई मरहम नहीं होता

किसी का मिलना क़िस्मत है, बिछड़ जाना मुक़द्दर है
बिछड़ने से कभी चाहत का जज़्बा कम नहीं होता

अगर वो वक़्ते-रुख़सत मुस्कराकर देख लेते तो
हमें उनसे बिछड़ने का ज़रा भी ग़म नहीं होता

कभी इक बूँद आँसू से तड़प उठता है दिल अपना
कभी अश्कों की बारिश से ये काग़ज़ नम नहीं होता

तड़प होती है दिल में तो जिगर कट-कट के बहता है
फ़क़त आँसू बहा देने से तो मातम नहीं होता

उन्हें मालूम क्या होगा कि लुत्फ़े-ज़िंदगी क्या है
कभी यादों में जिनकी दर्द का मौसम नहीं होता

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल-(2)

छुप-छुप कर तुम उसकी गली में अकसर आते-जाते हो
कोई पूछे इधर कहाँ तो क्यूँ इतना शरमाते हो

जिस चेहरे को देखके तुमने धनक सजाई आँखों में
ज़िक्र कहीं उसका आए तो तुम क्यूँ नज़र चुराते हो

चेहरा ख़ुद ही कह देता है दिल का सारा अफ़साना
हम तो ठहरे दोस्त तुम्हारे हमसे क्यूँ कतराते हो

दिल पे घाव लगे तो कोई मरहम काम नहीं आता
फूल की चाहत में काँटों से क्यूँ दामन उलझाते हो

हमने पूछा- कैसा है वो ! कहते हो कुछ याद नहीं
फिर क्यूँ साहिब तनहाई में छुपकर अश्क बहाते हो

इक ना इक दिन राज़ दिलों का दुनिया पर खुल जाता है
प्यार किया तो रुसवाई से क्यूँ इतना घबराते हो

ये रस्ता आसान नहीं है, इसमें जुदाई लाज़िम है
अपने दिल को समझाओ तुम क्यूँ हमको समझाते हो

 


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