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Monday, March 10, 2014

फागुन आया गाँव में, क्या-क्या हुए कमाल


फागुन के दोहे / देवमणि पांडेय
(1)
फागुन आया गाँव में, क्या-क्या हुए कमाल
आँखों से बातें हुईं , सुर्ख़ हुए हैं  गाल
(3)
पुरवाई में  प्रेम  की , ऐसे  निखरा  रूप
मुखड़ा गोरी का लगे, ज्यों सर्दी की धूप
 (3)
मौसम ने जादू किया, छलक उठे हैं रँ
गुलमोहर-सा खिल गया, गोरी का हर अंग
 (4)
साँसों में ख़ुशबू घुली, मादक हुई बयार
नैनों  में  होने लगी, सपनों की  बौछार
(5)

सपने कुछ ऐसे खिले, मन ढ़ूँढ़े मनमीत
दहके फूल पलाश के, ग़ायब हुई है नींद

(6)
मोबाइल पर कर रही, गोरी पी से बात
बिन मौसम होने लगी, आँखों से बरसात
(7)
दिल को भाया है सखी, साजन का यह खेल
मुँह से कुछ कहते नहीं, करते हैं ई मेल
(8)
मुड़कर देखा है मुझे, हुई शर्म से लाल
एक नज़र में हो गया, मैं तो मालामाल
(9)
रीत अनोखी प्यार की, और अनोखी राह
दिल के हाथों हो गए , कितने लोग तबाह
(10)
दिल की दौलत को भला, कौन सका है तोल
मोल यहाँ हर चीज़ का, चाहत है अनमोल

देवमणि पाण्डेय : 98210-82126,   devmanipandey@gmail.com



4 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (20.02.2014) को " जाहिलों की बस्ती में, औकात बतला जायेंगे ( चर्चा -1530 )" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें, वहाँ आपका स्वागत है, धन्यबाद ।

कालीपद प्रसाद said...

devmani pandey ji bahut sundar dohe hain.
New post: शिशु

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत सुंदर दोहे...!बधाई
मैंने आपका ब्लॉग फालो कर लिया है आप भी फालो करे,मुझे खुशी होगी,,,आभार

RECENT POST - आँसुओं की कीमत.

Abhilekh Dwivedi said...

Waah bahut sunder dohe! Main to abhi bas seekh raha hun..aur koshish jaari hai. Aapko mauka mile to zarur marg darshan karen..
abhilekh-dwivedi.blogspot.com
abhilekh-abhi-lekh.blogspot.com