मंगलवार, 13 जनवरी 2026

'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : ग़ज़ल संग्रह

 


'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' : देवमणि पांडेय का ग़ज़ल संग्रह

 

देवमणि पाण्डेय जी का ग़ज़ल-संग्रह 'कहाँ मंज़िलें कहाँ ठिकाना' एक प्रश्नानुभूति के साथ मेरे सामने है। एक तरफ़ ऐसा प्रतीत होता है कि यह शीर्षक अनभिज्ञता से जुड़ा हुआ है वहीं दूसरी तरफ जब हम इसके भीतर प्रवेश करते हैं तो पाते हैं कि यह जीवन रूपी निरंतर यात्रा के अनिश्चित पड़ावों की ओर भले ही संकेत कर रहा हो लेकिन ठहराव की बात नहीं करता है। ऐसा मैं इसलिए कह रही हूँ क्योंकि जब मैं इस संग्रह से गुज़री तो मेरा सामना ऐसे अनेक एहसासों से हुआ जो साधारण भाषा शैली और कथ्य के साथ संवेदनशील हृदय को उद्वेलित करने वाले थे।


इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति इसका सकारात्मक दृष्टिकोण और संघर्ष करने का जज़्बा है। आज के दौर में जब हताशा बहुत जल्दी युवाओं और समाज को घेर लेती है, पांडेय जी की ग़ज़लें एक उम्मीद की किरण बनकर आती है। वे आकाश में उड़ने की बात करते हैं, लेकिन ज़मीन से जुड़े रहकर। संग्रह के आरंभ में ही वे घोषणा करतें हैं कि 


परवाज़ की तलब है अगर आसमान में, 

ख़्वाबों को साथ लीजिए अपनी उड़ान में। 


यह सफलता का मूल मंत्र है, जो कहता है कि बिना सपनों के ऊँची उड़ान संभव नहीं है। उनका मानना है कि महत्वाकांक्षा रखना गलत नहीं है, लेकिन उस महत्वाकांक्षा के साथ सपनों का होना अनिवार्य है। यह शेर पाठकों को प्रेरित करता है कि वे अपनी सीमाओं को लांघकर असीम संभावनाओं की ओर देखें। आत्मविश्वास इस संग्रह का एक और प्रमुख स्वर है। जब वे कहते हैं


मेरा यक़ीन हौसला किरदार देखकर

मंजिल क़रीब आ गई रफ़्तार देखकर


तो स्पष्ट हो जाता है कि सफलता बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि आंतरिक चरित्र और आत्मविश्वास से मिलती है। यहाँ रफ़्तार केवल गति नहीं है, बल्कि जीवन जीने का उत्साह है। जब आपका किरदार मज़बूत होता है, तो मंज़िलें स्वयं आपके पास चलकर आती हैं। 


लेकिन यह भी सच है कि असफलता और गिरना जीवन का हिस्सा है, लेकिन गिरकर सँभलना ही वास्तविक जीवन है। पाण्डेय जी कहते हैं-


हम जब गिरे तो हमको सँभलना सिखा दिया, 

कुछ ठोकरों ने राह पर चलना सिखा दिया।


ठोकर को गुरु की भूमिका में लाने वाला यह शेर हमें बताता है कि कठिनाइयाँ हमारे रास्ते का पत्थर नहीं, बल्कि सीढ़ियाँ हैं। इसी क्रम में वे आगे कहते हैं- 


ख़्वाबों के कुछ परिंदों ने आकाश छू लिया

और ज़िंदगी ने दुख में बहलना सिखा दिया


यही तो जीवन का द्वंद्व है। एक तरफ आकाश छूने की ललक है, तो दूसरी तरफ दुख के साथ समझौता करने की कला। यही संतुलन एक सफल जीवन का आधार है।

पाण्डेय जी का आशावाद कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वह यथार्थ की भट्ठी में तपकर निकला है। 


आशावाद के पंख लगाकर उड़ती देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों की आत्मा उनके गाँव में बसती है। जैसे-जैसे हम आधुनिकता की ओर बढ़ रहे हैं, हमारे भीतर का गाँव मरता जा रहा है। इस संग्रह में गाँव के प्रति पाण्डेय जी का जो मोह है, वह केवल भावुकता नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक चेतावनी है। जब वे कहते हैं-


काग़ज़ों में है सलामत अब भी नक़्शा गाँव का, 

पर नजर आता नहीं पीपल पुराना गाँव का।


तो वे विकास के नाम पर हो रहे विनाश को रेखांकित करते हैं। नक्शे में गाँव तो है, यानी भूगोल जीवित है, लेकिन पुराना पीपल जो गाँव की संस्कृति, छाँव और साझा जीवन का प्रतीक था, वह ग़ायब हो चुका है। यह शहरीकरण की अंधी दौड़ पर एक करारा व्यंग्य है। गाँव का बदलना केवल भौतिक बदलाव नहीं है, बल्कि भावनात्मक भी है। "


बूढ़ीं आँखें मुंतज़िर हैं पर वो आख़िर क्या करें, 

नौजवां तो भूल ही बैठे हैं रस्ता गाँव का। 


कहकर पाण्डेय जी पलायन की उस त्रासदी को बयां करते हैं, जिसने भारत के गाँवों को वृद्धाश्रमों में बदल दिया है। युवा शहर जाकर वापस नहीं लौटना चाहते और गाँव अपनी संतानों की राह देखते-देखते बूढ़ा हो रहा है। 


पहले कितने ही परिंदे आते थे परदेस से, 

अब नहीं भाता किसी को आशियाना गाँव का।


यह शेर ऊपर कहे गये शेर का ही विस्तार है। जो परिदों का रूपक गढ़कर उन प्रवासियों के लिए अपनी बात कह रहा है, जो पहले त्यौहारों पर लौटते थे, लेकिन अब शहरों की चकाचौंध में अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। पाण्डेय जी ने गाँव के उजड़ने का जो चित्र खींचा है, वह अत्यंत मार्मिक है।


सावन की पुरवइया ग़ायब, 

पोखर, ताल-तलइया ग़ायब


कट गए सारे पेड़ गाँव के, 

कोयल औ' गोरइया ग़ायब। 


यह केवल गाँव का बदलना नहीं है, बल्कि पर्यावरण का विनाश भी है। गौरैया और कोयल का ग़ायब होना एक पारिस्थितिकीय संकट की ओर भी इशारा करता है। पाण्डेय जी उन लोक-परंपराओं को भी याद करते हैं जो अब विलुप्त हो रही हैं-


सोहर, कजरी, फगुआ भूले, 

बिरहा, नाच-नचइया ग़ायब।


यह सांस्कृतिक विस्मृति केवल चीज़ों को भूलने का बोध पैदा नहीं कर रही बल्कि वैश्वीकरण के दौर में हमारी पहचान को मिटा रही है। आधुनिकता ने गाँव के अर्थशास्त्र और सामाजिक ताने-बाने को कैसे बदला है, इसे भी पाण्डेय जी ने बड़ी बारीकी से पकड़ा है-


नोट निकलते ए टी एम से, 

पैसा, आना, पइया ग़ायब


और 


दरवाजे पर कार खड़ी है, 

बैल-भैंस और गइया ग़ायब।


गाँव की यह पीड़ा तब और गहरी हो जाती है जब पाण्डेय जी कहते हैं-


वक़्त ने क्या दिन दिखाए चंद पैसों के लिए, 

बन गया मज़दूर इक छोटा-सा बच्चा गाँव का। 


बाल मजदूरी और ग़रीबी की यह तस्वीर दिल को झकझोर देती है। 


ग़ज़लों में समय की तस्वीर उतारने वाले देवमणि पाण्डेय 

सामाजिक विसंगतियों और राजनीतिक पाखंड पर भी तीखे प्रहार किये हैं। देवमणि पांडेय एक सजग रचनाकार हैं जो अपने समय की नब्ज़ पहचानते हैं।


शिक्षा और रोज़गार के बीच के द्वंद्व को पाण्डेय जी ने बहुत ही व्यंग्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है-


पढ़-लिखकर क्या करेंगे आख़िर राम, श्याम, रहमान वग़ैरह, ये भी इक दिन बन जाएँगे चपरासी, दरबान वग़ैरह। 


यह शेर भारत की शिक्षा व्यवस्था और बेरोज़गारी की समस्या पर एक कड़वा सच है। डिग्री लेने के बाद भी युवाओं का चपरासी या दरबान बनने को मजबूर होना एक राष्ट्रीय त्रासदी है। वहीं अगले शेर में वे कहते हैं-


रोजी-रोटी के चक्कर में हमने ख़ुद को गँवा दिया है, 

कहाँ गया अपना वो तेवर, खुद्दारी, पहचान वग़ैरह


यह उस मध्यवर्गीय आदमी की व्यथा है जो आजीविका कमाने की दौड़ में अपने स्वाभिमान और मूल स्वभाव से समझौता कर लेता है।


राजनीति पर कटाक्ष करते हुए देवमणि पाण्डेय जी कहते हैं-

 

दूर-दूर तक आदर्शों से रिश्ता नहीं सियासत का जब,

इनमें कहाँ नज़र आएँगे सच्चाई, ईमान वग़ैरह।


सांप्रदायिकता और दंगे भड़काने वाली राजनीति पर भी पाण्डेय अपनी बात कहने से नहीं कतराते हैं। वे स्पष्ट रूप से देख रहे हैं कि सत्ता के लिए किस तरह समाज को बांटा जाता है-


ख़ुद को कहते हैं वो मुल्क का रहनुमा, 

रोटियाँ सेंकते हैं फ़सादात पर।


किसानों की दुर्दशा भी उनकी आँखों से छिपी नहीं है। गाँवों से उनका जुड़ाव उन्हें किसानों की यथास्थिति के और क़रीब ले जाता है-


मौसम ने क़हर ढाया दहशत है किसानों में, 

दम तोड़ती हैं फ़सलें खेतों खलिहानों में


और 


धरती की गुज़ारिश पर बरसे ही नहीं बादल, 

तब्दील हुई मिट्टी खेतों की चटानों में। 


यह सूखा और प्राकृतिक आपदा की मार झेलते अन्नदाता का दर्द है। लेकिन इससे भी बड़ा दर्द है सत्ता की संवेदनहीनता का-


क्यूँ कैसे मरा कोई क्या फ़िक्र सियासत को, 

पत्थर की तरह नेता बैठे हैं मकानों में। 


पाण्डेय जी की ग़ज़लों में आधुनिकता, रिश्तों की ऊष्मा और उनकी टूटती कड़ियाँ पर भी कई शेर मिलते हैं। परिवार, जो भारतीय समाज की रीढ़ रहा है, अब कैसे बिखर रहा है, इसे पांडेय जी ने बहुत गहराई से महसूस किया है-


अपने ही जब ग़ैर हुए तो वो वृद्धाश्रम चले गए, 

ख़ुश है बेटा, बहू के सर पे अब कोई जंजाल नहीं। 


आधुनिक समाज के मुँह पर व्यंग्य का तमाचा मारता हुआ यह शेर कितना मर्मस्पर्शी है। माता-पिता को जंजाल समझना और उन्हें वृद्धाश्रम भेजना उस नैतिक पतन की पराकाष्ठा है, जिसकी ओर हम बढ़ रहे हैं। पाण्डेय जी इंतज़ार और अकेलेपन के उस दर्द को भी शब्दायित कर रहे हैं जो दीवारों के भीतर घुटता रहता है। एक तरफ बुज़ुर्गों की उपेक्षा है, तो दूसरी तरफ़ बच्चों का खोता बचपन। कुछ भी उनकी आँखों से अछूता नहीं है-


क्या-क्या नहीं दिया बचपन को इंटरनेट की दुनिया ने, 

बच्चों के अफ़सानों में क्यूँ वो बूढ़ा बेताल नहीं। 


इंटरनेट और मोबाइल ने बच्चों से उनकी कल्पनाशीलता, उनकी परियों और बेताल की कहानियाँ छीन ली हैं। वह मासूमियत, वह काग़ज़ की नाव, वह बारिश का आनंद - सब डिजिटल स्क्रीन के पीछे खो गया है-


बच्चों के हाथों में जब से ये मोबाइल आया है, 

बहते पानी में काग़ज़ की नाव चलाना भूल गए। 


ऐसा नहीं है कि उन्होंने सारा दोष मोबाइल या उत्तर आधुनिकता को देकर पल्ला झाड़ लिया है। वे शिक्षा के भारी बस्ते के द्वारा बच्चों के बचपन का कुचला जाना भी महसूस कर रहे हैं-


बचपन की पीठ पर है किताबों का एक बोझ, 

बच्चों को खेलकूद की मोहलत नहीं रही।


संयुक्त परिवारों के विघटन को पाण्डेय जी ने एक ही शेर में समेट दिया है-


जब फ़ासले हुए हैं तो रोई है माँ बहुत, 

बेटों के दिल के दरमियां दीवार देखकर। 


घर का बँटवारा केवल दीवारों का बँटवारा नहीं होता, वह माँ के दिल का बँटवारा होता है। इसी तरह, आधुनिक दांपत्य जीवन की विडंबना देखिए- 


एक ही कमरे में दोनों रह रहे हैं साथ-साथ, 

फिर भी उनके दिल जुदा हैं राब्ता कोई नहीं। 


शारीरिक निकटता के बावजूद भावनात्मक दूरी आज के रिश्तों की सच्चाई है। जिसे पाण्डेय जी ने बहुत ख़ूबसूरती के साथ अभिव्यक्त किया है। 


जीवन की विडंबनाओं, सामयिक विसंगतियों और विद्रूपताओं को शब्दायित करते हुए भी पाण्डेय जी ग़ज़ल के पारम्परिक परिपाटी को अर्थात् प्रेम को अभिव्यक्त करना नहीं भूले हैं। उन्होंने इस परंपरा को भी बखूबी निभाया है। उनके प्रेमिल शेरों में एक शालीनता है, एक ठहराव है। यथा-


जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको ही पढ़ता रहूँ, 

याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई। 


इस शेर में प्रेमिका ग़ज़लकार के लिए एक 'कहानी' बन गयी है, जिसे वह बार-बार पढ़ना चाहता है। 


इतना ही नहीं वे प्रेम में एक ऐसी अनुभूति की बात करते हैं, जहाँ प्रेमी और ईश्वर का स्थान एक जैसा प्रतित होता है-


कहीं भी ढूँढ़ो कहाँ नहीं है, 

कोई भी उसके सिवा नहीं है 


वो बादलों में, वो बिजलियों में 

निहां है फूलों में उसकी खुशबू।


पाण्डेय जी की ग़ज़लों में विरह के क्षणों का चित्रण भी अद्भुत है। वे बिम्बों में विरह का चित्र गढ़ रहे हैं-


सुलगती है कहीं कैसे कोई भीगी हुई लकड़ी 

दिखाई देगा ये मंज़र किसी विरहन की आंखों में 


रिश्ता भी ख़ुद में होता है स्वेटर ही की तरह, 

उधड़ा जो एक बार, उधड़ता चला गया। 


यह उपमा कितनी बेमिसाल है। रिश्तों का उधड़ना और उन्हें फिर से न जोड़ पाना; यह एक ऐसी टीस है, जिसे हर वो व्यक्ति समझ सकता है जिसने कभी किसी को खोया है।


अबके कभी वो आया तो आएगा ख़्वाब में, 

आँखों के सामने से तो कब का चला गया।


प्रेम में शिकायतें भी हैं और समर्पण भी-


जो हमसफ़र थे आपसे आगे निकल गए, 

धीमी बहुत है आपकी रफ़्तार क्या करें।


प्रेम की बात करते हुए पाण्डेय जी का कहन एक अलग तरह की ख़ूबसूरती और सहजता को जीने लगता है। ऐसे तो उनके अन्य शेरों का भी अंदाज़ अलग सा है पर प्रेम की तो बात ही कुछ और है। शेर देखें-


 चेहरे से आपके भी झलकने लगा है इश्क़, 

जी खुश हुआ है आपको बीमार देखकर। 


यहाँ बीमार होना एक व्यंग्य नहीं, बल्कि प्रेम में पड़ने का सुखद संकेत है।


देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों में एक अंतर्धारा आध्यात्मिकता की भी बहती है। वे ईश्वर को मंदिर-मस्जिद में नहीं, बल्कि कण-कण में देखते हैं-


नफ़स-नफ़स में है उसकी आहट, 

उसी से क़ायम है दिल की धड़कन।


या


दीन-धरम बस यही है अपना साथ इसी के जीना है, 

प्यार छुपा है जिस दिल में वो काशी और मदीना है। 


देवमणि पांडेय जी की ग़ज़लों की भाषाई विविधता और शिल्प की बात करें तो वे सरल, सहज और आम-समझ की ग़ज़लें लिखने वाले ग़ज़लकार हैं, जिसमें उर्दू मिश्रित आम बोलचाल की हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग किया गया है। लेकिन उनका कथ्य बिल्कुल सपाट नहीं है। उनके बिंब और प्रतीक बहुत ही ताज़ा और मौलिक हैं। उनके पास ऐसे उपमान हैं, जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से उठाये गये हैं। उन्होंने ग़ज़ल के पारंपरिक रूप को बनाए रखते हुए उसमें आधुनिक संवेदनाओं को पिरोया है। उनके पास कहने को बहुत कुछ है। ऐसा लगता है जैसे एक ग़ज़ल कहते हुए वे विभिन्न भावों को गीत की तरह बांधते चले जाते हैं। उनका यह प्रवाह जितना व्यापक है उतना ही हक़ीक़त से जुड़ा हुआ। वे कहते भी हैं-


सपनों को पालने की रिवायत न तोड़िए, 

लेकिन जनाब! इनको हक़ीक़त से जोड़िए। 


यही इस पुस्तक का सार है और यही जीवन का सत्य भी।


गरिमा सक्सेना : मकान संख्या- 212 ए-ब्लाॅक, सेंचुरी सरस अपार्टमेंट, अनंतपुरा रोड, यलहंका, बैंगलोर, कर्नाटक-560064+

Mob : 917694928448 


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शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

आरजे प्रीति गौड़ की अंतिम यात्रा



अलविदा प्रीति गौड़

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई 

 में रचनाकार, कलाकार, इष्टमित्र और पारिवारिक सदस्य अच्छी तादाद में मौजूद थे। गोरेगांव के शिवधाम शमशान गृह में सभी ने नम आँखों से उन्हें अंतिम विदाई दी। वे कैंसर से पीड़ित थीं। 28 नवम्बर 2025 को सुबह 10:25 बजे मुम्बई के ऑस्कर हॉस्पिटल में उनका आकस्मिक निधन हुआ। 

प्रीति के जीवन साथी शैलेंद्र गौड़ के आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने बताया कि पिछले चार साल से प्रीति का इलाज चल रहा था। उसने किसी को बताने से मना किया था। पिछले दो साल में प्रीति कई बार चित्रनगरी संवाद मंच के कार्यक्रमों में आईं। उन्होंने कई कार्यक्रमों में हंसते मुस्कुराते हुए शिरकत की। अपने रोचक क़िस्सों से ठहाके लगवाए। मगर कभी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई पड़ी। 


साल भर पहले मेरे जन्मदिन पर शैलेंद्र के साथ प्रीति गौड़ मेरे घर आईं। वहां भी उन्होंने धूम मचाई। वे एक बेहतरीन उदघोषक होने के साथ ही अच्छी अभिनेत्री भी थीं। जब वे अभिनय के साथ कामवाली बाइयों की बातचीत सुनातीं तो लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो जाते थे। प्रीति गौड़ को एक ज़िंदादिल, विनम्र और मिलनसार इंसान के रूप में में हमेशा याद किया जाएगा। 


मौत को स्वीकार करना ज़िंदगी की सच्चाई है। लेकिन जिस तरह प्रीति ने हंसते-हंसते मौत का सामना किया वह हम सबके लिए प्रेरणा स्रोत है।  आपके साथ कुछ तस्वीरें साझा कर रहा हूं। ये प्रीति गौड़ के हंसते खिलखिलाते जीवन की साक्षी हैं। ऐसी मधुर स्मृतियों में वह हमेशा हम सबके साथ मौजूद रहेगी। वह जहां भी रहे सुकून से रहे, हम सब की यही दुआएं हैं। 



आपका : देवमणि पांडेय

सम्पर्क : 98210 82126 

गुरुवार, 27 नवंबर 2025

गरिमा सक्सेना का ग़ज़ल संग्रह 'रोशनी के पक्ष में'


रोशनी के पक्ष में : गरिमा सक्सेना का ग़ज़ल संग्रह

ग़ज़ल के दरिया में अब तक न जाने कितना पानी बह चुका है। इसी के साथ ही रचनात्मकता के इस क़ाफ़िले में नए विचार, नए कथ्य और नए दृश्य शामिल हुए। अभिव्यक्ति की यही नवीनता ग़ज़ल की पूंजी है जो उसे और समृद्ध बनाती है। आज के दौर में ग़ज़ल की इन्हीं ख़ूबियों की साक्षी हैं गरिमा सक्सेना। श्वेतवर्णा प्रकाशन नोएडा से प्रकाशित उनके ग़ज़ल संग्रह का नाम है “रोशनी के पक्ष में”। वे अपनी ग़ज़ल के वितान में ऐसे चिंतन, मनन और अनुभव को शामिल करती हैं जो उनकी रचनात्मकता को एक नई ऊर्जा से संपन्न करते हैं। 

जो किसी को दे उजाला, उस ख़ुशी के पक्ष में, 
इस अंधेरे वक़्त में हूं रोशनी के पक्ष में। 

कभी रंगीन परदों से, कभी दिलकश नज़ारों से,
हमारा सच छुपाया जा रहा है इश्तहारों से। 

आज हम जिस आधुनिक समय में जी रहे हैं वहां ऐसी चीज़ों को अनदेखा नहीं कर सकते जो हमारे दिन प्रतिदिन के व्यवहार में दखल रखती हैं। यही कारण है कि गरिमा की ग़ज़लों में मोबाइल से लेकर इंस्टाग्राम तक शामिल हैं। सोशल मीडिया उनके यहां एक रचनात्मक ज़रूरत के तहत मौजूद है। 

उत्सव का असली मतलब अब शेष बचा क्या? 
सेल्फ़ी लेने तक ही बस मुस्काते उत्सव। 

हमारे आसपास की दुनिया में स्याह रंग अधिक हैं। बेशक़ उनकी अभिव्यक्ति होनी चाहिए मगर ज़िंदगी के कैनवास पर मुहब्बत की तस्वीर भी ज़रूरी है। गरिमा सक्सेना की ग़ज़लों में कभी-कभार दिलों के तार झंकृत करने वाले अशआर भी नज़र आते हैं। हौसलों की उड़ान और रिश्तों की गर्माहट भी दस्तक देती है- 

बाग़ में उड़ती हुई इन तितलियों को देखकर, 
एक लड़की हो गई तैयार उड़ने के लिए। 

मेरे सिर में तो दर्द है लेकिन, 
कब अकेले मैं चाय पीती हूं। 

गरिमा सक्सेना गीत, नवगीत और दोहे लिखने में सिद्धहस्त हैं। इस रचनात्मक कौशल का फ़ायदा उनकी ग़ज़लों को भी मिला है। एक तरफ़ उनकी ग़ज़लों के कथ्य में ताज़गी और सामयिकता है तो दूसरी तरफ़ अभिव्यक्ति में व्यंजना और भाषा में जीवंतता है। सृजनात्मकता के यही तेवर उन्हें विशिष्ट पहचान देते हैं। वे जिस तरह अपनी ग़ज़लों में वे समय और समाज को दर्ज करती हैं वह कौशल सराहनीय है। उदाहरण के तौर पर उनके चंद शेर देखिए- 

कहीं पे चीड़, कहीं पे चिनार रोते हैं, 
पहाड़ मर रहे हैं, देवदार रोते हैं। 

गांव से हम तो निकल आए हैं लेकिन, 
गांव निकला ही नहीं मन से हमारे। 

यह खुले बाज़ार हैं केवल कमाई के लिए, 
मौत भी बिकती यहां पर ज़िंदगी की शक्ल में। 

ज़िंदगी की विविधरंगी छवियों को क़लम बंद करने के साथ ही गरिमा मानव मन की धूप छांव को भी अपनी रचनात्मकता के दायरे में लाती हैं - 

चार बच्चों का पिता भी अपनी मां को देखकर, 
खिल उठा है फूल जैसा एक बच्चे की तरह। 

हर एक हाल या सूरत में काम आते हैं, 
जो दोस्त हैं वो ज़रूरत में काम आते हैं। 

गरिमा सक्सेना ने अपने आसमान, अपनी ज़मीन और अपनी आंखों से देखी हुई दुनिया को अपनी अभिव्यक्ति का हमसफ़र बनाया है। उसे अपनी सोच और सरोकारों से सजाया है। आम आदमी के सुख-दुख, हिम्मत और हौसले को आज़माया है। उनकी ग़ज़लें ख़ुद अपनी रोशनी से जगमगाती हैं। इस उथल-पुथल भरे समय में उम्मीद की किरण की तरह नज़र आती हैं। 

आंखों में ख़्वाब, पांवों में छालों को पालकर, 
लाई हूं मैं अंधेरे से सूरज निकाल कर। 

इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल संग्रह के ज़रिए गरिमा सक्सेना ने बेहतर संभावनाओं का संकेत दिया है। मुझे पूरी उम्मीद है कि अपनी प्रतिभा और लगन से वे ग़ज़लों के गुलशन में कुछ नए फूल खिलाने में कामयाब होंगी। उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं। 


देवमणि पांडेय : बी-103, दिव्य स्तुति, कन्या पाडा, गोकुलधाम, फ़िल्मसिटी रोड, गोरेगांव पूर्व, मुम्बई-400063, 98210 82126

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