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Friday, February 27, 2015

ख़ुशबुओं की शाल ओढ़े रुत सुहानी मिल गई


यात्री रंग समूह के खुलामंच-6 में शायर देवमणि पांडेय की शायरी का लुत्फ़ उठाते वरिष्ठ रंगकर्मी ओम कटारे और अशोक शर्मा (मुम्बई 8-2-2015)


देवमणि पांडेय की ग़ज़ल

ख़ुशबुओं की शाल ओढ़े रुत सुहानी मिल गई 
दिल में ठहरे एक दरिया को रवानी मिल गई 

कुछ परिंदों ने बनाए आशियाने शाख़ पर
गाँव के बूढ़े शजर को फिर जवानी मिल गई

आ गए बादल ज़मीं पर सुनके मिट्टी की सदा
सूखती फ़सलों को पल में ज़िंदगानी मिल गई 

घर से निकला है पहनकर जिस्म ख़ुशबू का लिबास
लग रहा है गोया इसको रातरानी मिल गई 

इक पुरानी डायरी में मिल गया सूखा गुलाब
खो गई थी जो मुहब्बत की निशानी मिल गई

जी ये चाहे उम्र भर मैं उसको ही पढ़ता रहूँ
याद की खिड़की पे बैठी इक कहानी मिल गई 

माँ की इक उँगली पकड़कर हँस रहा बचपन मेरा
एक अलबम में वही फोटो पुरानी मिल गई

देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 


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