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Monday, April 30, 2012

रोटी बासी लगती है स्टील की थाली में



चित्र  में डॉ.कलीम ज़िया, अब्दुल अहद साज़, देवमणि पाण्डेय, सलमा सिद्दीक़ी, जावेद सिद्दीक़ी, ज़फ़र गोरखपुरी, ज़मीर काज़मी, वरिष्ठ पत्रकार लाजपत राय और बेबी फ़िज़ा (mumbai 26.05.2012)

 
शायर ज़फ़र गोरखपुरी की किताब 'मिट्टी को हँसाना है' का लोकार्पण

ज़फ़र गोरखपुरी के दोहे मिट्टी के कुल्लहड़ में पेश की गई चाय की तरह हैं। इस चाय में मिट्टी की जो सोंधी गंध घुली होती है वही गंध ज़फ़र साहब के दोहों में भी है। ऐसे दोहे वही लिख सकता है जिसने किसान बनकर हल की नोंक से धरती को गुदगुदाया हो, मिट्टी को हँसाया हो।'' इन ख़यालों का इज़हार जाने-माने रंगकर्मी एवं फ़िल्म लेखक जावेद सिद्दीक़ी ने किया। शायर ज़फ़र गोरखपुरी के गीतों और दोहों की किताब 'मिट्टी को हँसाना है' के रिलीज़ के मौक़े पर अपनी राय ज़ाहिर करते हुए उन्हों ने आगे कहा-  ज़फ़र साहब के दोहे हमारी सोच में ऐसे दाख़िल होते हैं जैसे साँसो में लोबान के धुँए की ख़ुशबू-

वो दिल जिसमें दर्द है उसकी ये पहचान
जल जाए तो दीप है, सुलगे तो लोबान

मरहूम कथाकार कृश्न चंदर की शरीके-हयात मोहतरमा सलमा सिद्दीक़ी ने अपने मुबारक हाथों से शायर ज़फ़र गोरखपुरी की किताब 'मिट्टी को हँसाना है' का लोकार्पण शनिवार 26 मई 2012 को भवंस कल्चरल सेंटर अंधेरी, मुम्बई में किया। सलमा आपा ने कहा- कोई इंसान अपने बीवी-बच्चों को हँसाना चाहता है तो कोई अपने यार-दोस्तों को। मगर ज़फ़र साहब ऐसे इंसान हैं जो मिट्टी को हँसाना चाहते हैं। इससे ज़फ़र साहब के रचनात्मक सरोकार का पता चलता है। प्रगतिशील लेखक संघ के मूमेंट में ज़फ़र साहब की भागीदारी की तारीफ़ करते हुए सलमा आपा ने कहा कि ज़फ़र साहब ऐसे शायर हैं जिन्होंने क़लम के तेशा से मुश्किलों के पहाड़ों को काटकर शायरी के लिए रास्ता बनाया।

मा'रूफ़ शायर अब्दुल अहद साज़ ने कहा कि ज़फ़र साहब के गीत और दोहे हिंदुस्तान के रिवायती और जदीद समाज का आईना हैं। उनके यहाँ निजी एहसास की नर्मी भी है और सामाजिक सरोकार की आग भी है। वे ज़मीन पर खड़े होकर मानवीयत का परचम लहराते हैं। मशहूर शायर देवमणि पाण्डेय ने कहा---कुछ लोगों का मानना है कि उर्दू में गीत को और हिंदी में ग़ज़ल को अभी तक वो मुक़ाम हासिल नहीं हुआ है जिसके वो हक़दार हैं। लेकिन ज़फ़र गोरखपुरी साहब ने अपने गीतों को कामयाबी की मंज़िल तक पहुँचाकर आने वाली पीढ़ी के लिए एक नायाब मिसाल पेश की है। उनके गीत दिलों को छूते हैं क्योंकि उसमें अपनी मिट्टी की ख़ुशबू, एहसास की शिद्दत और रिश्तों की सुगंध है। मिसाल के तौर पर एक गीत की चंद लाइनें देखिए-

सखी उन्होंने लिक्खा था पिछली दीवाली में
बुन रखना इक डलिया सावन की हरियाली में
रोटी बासी लगती है स्टील की थाली में
साजन खा न सकें जी भर के क्या ये ठीक लगे
ओ री सखी! ये डलिया बुनना कैसा नीक लगे




मुशायरे में ज़मीर काज़मी, देवमणि पाण्डेय, अयाज़ गोरखपुरी, ज़फ़र गोरखपुरी, अब्दुल अहद साज़, दीप्ति मिश्र, सिकंदर मिर्ज़ा और प्रज्ञा विकास (mumbai 26.05.2012)

ज़फ़र गोरखपुरी की रचनात्मकता की तारीफ़ करते हुए पांडेय जी ने कहा कि ज़िंदगी की असरदार और सच्ची तस्वीर पेश करने वाले ज़फ़र गोरखपुरी के गीत और दोहे पढ़ने-सुनने वालों के साथ फ़ौरन अपना एक नज़दीकी रिश्ता क़ायम कर लेते हैं। उर्दू-हिंदी के ख़ज़ाने में ज़फ़र गोरखपुरी के गीत एक क़ीमती इज़ाफ़ा हैं। बल्कि यूँ कहा जाए कि ये गीत ऐसे मोड़ का पता देते हैं जहाँ से गीतों का एक नया क़ाफ़िला आगे की ओर रवाना होगा। उनके दोहों में आज के दौर की दास्तान होने के साथ-साथ देहाती ज़िंदगी का उल्लास भी है और दर्द भी है-

घरवाली को रात दिन मनिआर्डर की आस
माता अपने लाल की चिट्ठी बिना उदास

डॉ.कलीम ज़िया, विधायक नवाब मलिक, समाजसेविका रेहाना उंद्रे, कवयित्री माया गोविंद, उर्दू फाउंडेशन के अध्यक्ष मीर साहब हसन और समारोह अध्यक्ष डॉ.शेख़ अबदुल्ला ने भी ज़फ़र साहब को मुबारकवार दी। बुक रिलीज़ के बाद तिर्याक़ (उर्दू मंथली) के एडीटर शायर ज़मीर काज़मी की सदारत और हिंदी-उर्दू के मशहूर शायर देवमणि पांडेय की निज़ामत में एक मुशायरा हुआ जिसे सामयीन ने बहुत पसंद किया। इसमें अयाज़ गोरखपुरी, दीप्ति मिश्र, प्रज्ञा विकास, अब्दुल अहद साज़, सिकंदर मिर्ज़ा, डॉ.कलीम ज़िया, देवमणि पांडेय, ज़मीर काज़मी और ख़ुद ज़फ़र गोरखपुरी ने ग़ज़ल-गीत-दोहे सुनाकर समाँ बाँध दिया।

शायरा दीप्ति मिश्र ने आधुनिक रिश्तों की तरजुमानी इस तरह पेश की-
दुखती रग पर उंगली रखकर पूछ रहे हो कैसी हो
तुमसे ये उम्मीद नहीं थी , दुनिया चाहे जैसी हो
तुम्हे किसने कहा था, तुम मुझे चाहो, बताओ तो
जो दम भरते हो चाहत का, तो फिर उसको निभाओ तो

जदीदियत के रंग में ढली शायरा प्रज्ञा विकास की शायरी को सामयीन ने  भरपूर दाद से नवाज़ा-
किसी की याद की सिगरेट जलाके रोई थी
धुँए की बाँह पे सर रखके रात सोई थी
अपने सीने से लगा के मुझको बहलाती रही
घर की इक दीवार सारी रात समझाती रही

शायदेवमणि पांडेय ने उर्दू ज़बान का शुक्रिया इस तरह अदा किया-
इस क़दर ख़्वाब महके कि ये ज़िंदगी / जैसे फूलों की कोई रिदा हो गई
मैंने उर्दू में दिलकश ग़ज़ल क्या कही / इक हसीं लड़की मुझ पर फ़िदा हो गई

ज़फ़र गोरखपुरी ने कुछ दोहे और गीत सुनाकर रंग जमा दिया-
कच्ची, सोंधी-सोंधी मिट्टी, नीम की ठंडी छाँव
जाने उनसे कब मिलना हो, कब आना हो गाँव
मन की झोली में दुख सेरों, आशा एक छटाँक
गाड़ी धीरे-धीरे हाँकमेरे भैया गाड़ीवान, गाड़ी धीरे-धीरे हाँक

जनता की फ़रमाइश पर ज़फ़र साहब ने चंद शे'र भी सुनाए-
वक़्त  होठों  से मेरे  वो  भी  खुरचकर  ले  गया
एक तबस्सुम जो था दुनिया को दिखाने के लिए
देर  तक  हंसता  रहा  उन  पर  हमारा   बचपना
तजरुबे   आए   थे   संजीदा  बनाने   के   लिए

अब्दुल अहद ‘साज़’ की ग़ज़लों में नयापन और ताज़गी थी-
मौत से आगे सोच के आना फिर जी लेना
छोटी छोटी बातों में दिलचस्पी लेना
आवाज़ों के शहर से बाबा ! क्या मिलना है
अपने अपने हिस्से की ख़ामोशी लेना

 कुल मिलाकर यह एक ऐसा बेहतरीन प्रोग्राम था जिसे सुनने वाले बरसों याद रखेंगे। इस समारोह का आयोजन उर्दू फाउंडेशन एवं भवंस कल्चर सेंटर अंधेरी (मुम्बई) की जानिब से किया गया।

1 comment:

pran sharma said...

JANAAB ZAFAR GORAKPUREE KEE GEET
AUR DOHON KEE KITAAB ` MATTEE KO
HANSAANAA HAI ` KE LOKAARPAN KE
SAMAAROH KAA VIVRAN PADH KAR BAHUT
ACHCHHAA LAGAA HAI . ZAFAR SAAB KO
DHERON MUBAARAQEN .
BEHTREEN PROGRAMME KE LIYE SABHEE
SHAAYAR BADHAAEE KE PATR HAIN .