Tuesday, April 19, 2011

ख़्वाब सुहाने दिल को घायल कर जाते हैं कभी कभी




देवमणि पाण्डेय की गज़ल

ख़्वाब सुहाने दिल को घायल कर जाते हैं कभी कभी
अश्कों से आँखों के प्याले भर जाते हैं कभी कभी

पल पल इनके साथ रहो तुम इन्हें अकेला मत छोड़ो
अपने साए से भी बच्चे डर जाते हैं कभी कभी

खेतों को चिड़ियां चुग जातीं बीते कल की बात हुई
अब तो मौसम भी फ़सलों को चर जाते हैं कभी कभी
जिनके फ़न को दुनिया अकसर अनदेखा कर देती है
वो ही इस दुनिया को रोशन कर जाते हैं कभी कभी

आँख मूँदकर यहाँ किसी पर कभी भरोसा मत करना
यार-दोस्त भी सर पे तोहमत धर जाते हैं कभी कभी

अगर किसी पर दिल आ जाए इसमें दिल का दोष नहीं
अच्छा चेहरा देखके हम भी मर जाते हैं कभी कभी

मेरे शहर में मिल जाते हैं ऐसे भी कुछ दीवाने
रात-रात भर सड़कें नापें घर जाते हैं कभी कभी
ना पीने की आदत हमको ना परहेज़ है पीने से
हम भी जाते हैं मयख़ाने पर जाते हैं कभी कभी


देवमणि पांडेय : 98210-82126
devmanipandey@gmail.com 

Tuesday, April 12, 2011

ख़ुशियों में बड़ा लुत्फ़ है

मा.सार्थक अपने नाना देवमणि पांडेय के साथ


देवमणि पांडेय की पाँच ग़ज़लें


(1)

ख़ुशियों में बड़ा लुत्फ़ है, ये सबको पता है
ग़म से भी कभी गुज़रो, ग़म में भी मज़ा है

पल भर के लिए वो कभी रस्ते में मिला था
इस दिल पे मगर अपना निशां छोड़ गया है

ये धूप,धनक, चाँदनी, फूलों का तबस्सुम
इन सबमें तेरा अक्स है, तेरी ही अदा है

किस-किसने मुझे ज़ख़्म दिए,किसने दवा दी
अब सबके लिए लब पे मेरे सिर्फ़ दुआ है

राहों का पता ही नहीं, मंज़िल की ख़बर क्या
कुछ फ़िक्र नहीं साथ मेरे मेरा ख़ुदा है

(2)

कहाँ गई एहसास की ख़ुश्बू, फ़ना हुए जज़्बात कहाँ
हम भी वही हैं तुम भी वही हो लेकिन अब वो बात कहाँ

मौसम ने अँगड़ाई ली तो मुस्काए कुछ फूल मगर
मन में धूम मचा दे अब वो रंगों की बरसात कहाँ

मुमकिन हो तो खिड़की से ही रोशन कर लो घर-आँगन
इतने चाँद सितारे लेकर फिर आएगी रात कहाँ

ख़्वाबों की तस्वीरों में अब आओ भर लें रंग नया
चाँद, समंदर, कश्ती, हम-तुम,ये जलवे इक साथ कहाँ

इक चेहरे का अक्स सभी में ढूँढ रहा हूँ बरसों से
लाखों चेहरे देखे लेकिन उस चेहरे-सी बात कहाँ

(3)


दुख लम्बी राहों में भी सुख की थोड़ी आस रहे
फिर ख़ुशियों के पल आएँगे दिल में ये एहसास रहे

इस दुनिया की भीड़ में इक दिन हर चेहरा खो जाता है
रखनी है पहचान तो अपना चेहरा अपने पास रहे

आदर्शों को ढोते-ढोते ख़ुद से दूर निकल आए
और अभी जाने कितने दिन देखो ये वनवास रहे

लफ़्ज़ अगर पत्थर हो जाएँ रिश्ते टूट भी सकते हैं
बेहतर है लहजे में अपने फूलों-सी बू-बास रहे

कहीं भी जाऊँ दिल का मौसम इक जैसा ही रहता है
यादों के दरपन में कोई चेहरा बारो-मास रहे

(4)


न हो मायूस ऐसे दिल किसी का
छुपा है अश्क में चेहरा ख़ुशी का

तुम्हारा साथ छूटा तो ये जाना
यहां होता नहीं कोई किसी का

न जाने कब छुड़ा ले हाथ अपना
भरोसा क्या करें इस ज़िंदगी का

अभी तक ये भरम टूटा नहीं है
समंदर साथ देगा तिश्नगी का

भला किस आस पर ज़िंदा रहे वो
अगर हर ख़्वाब टूटे आदमी का

लबों से मुस्कराहट छिन गई है
ये है अंजाम अपनी सादगी का

(5)


कहाँ तक मैं दिन-रात आँसू बहाऊँ
तमन्ना है मैं भी कभी मुस्कराऊँ

कभी मैंने ख़ुद से लगाई थी बाज़ी
किसी दिन उसे भूलकर मैं दिखाऊँ

अभी तक ये दिल से बहस चल रही है
उसे याद रक्खूँ कि मैं भूल जाऊँ

ये जी चाहता है कि बन जाऊँ मोती
कभी उसकी पलकों पे मैं झिलमिलाऊँ

कभी उसकी यादों के घेरे से निकलूं
कभी मैं भी उसको बहुत याद आऊँ