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Thursday, May 5, 2016

इक पल भी जिंदगी का अपने नहीं है बस में

DEVMANI PANDEY 

देवमणि पांडेय की ग़ज़ल 

लगता है जी रहे हैं जैसे  किसी क़फ़स में
इक पल भी जिंदगी का अपने नहीं है बस में

परवाज़ कैसे  देगा ख्वा़बों को अपने इंसां
जब टूटती नहीं हैं उससे रिवाज़-ओ-रस्में

सब कुछ तो मिल गया है फिर भी सुकूं नहीं है
क्या ची़ज खो गई है पाने की इस हवस में

इस जिँदगी से आगे क्या और जि़दंगी है
उलझी हुई है दुनिया सदियों से इस बहस में

रिश्तों से धीरे-धीरे उठने लगा भरोसा
क्यूँ लोग हर क़दम पर खाते हैं झूठी क़समें

मुझसे  बिछ्ड़ के उसको रहती है फ़िक्र मेरी
खू़बी है कुछ तो आखि़र उस मेरे हमनफ़स में

पिछले बरस न पूछो क्या हाल था हमारा
कीजे दुआ कि आँखें नम न हों इस बरस में

देवमणि पाण्डेय : 98210-82126 
 devmanipandey@gmail.com
 
























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