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Wednesday, September 1, 2010

रेलकर्मी शैलेंद्र और शो मैन राजकपूर


गीतकार शैलेंद्र के तेवर का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक तरफ़ वे प्रगतिशील लेखक संघ (PWA) के सक्रिय सदस्य थे तो दूसरी तरफ़ इप्टा जैसे मंच से भी जुड़े हुए थे। क्रांतिकारी होने के बावजूद वे इतने सीधे-सादे और सरल थे कि जब फ़िल्म जगत में आए तो दूध में शक्कर की तरह घुल गए। उन दिनों उन्होंने अपने एक गीत में मिल मज़दूरों का हौसला बढ़ाने के लिए लिखा था- हर ज़ोर-ज़ुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है। आज भी मेहनतकश- मज़दूरों का सबसे प्रिय नारा यही है।


जाने माने शो मैन राजकपूर और गीतकार शैलेंद्र की मुलाका़त एक दिलचस्प इत्तफा़क था। इस बारे में मैंने मुम्बई के कई लोगों से पता करने की कोशिश की कि वास्तव में इन दो महान हस्तियों की मुलाक़ात कैसे हुई। वयोवृद्ध फ़िल्म पत्रकार और संगीत संग्राहक सी.एम.देसाई से जो जानकारी मुझे प्राप्त हुई वही मैं आप सबके सामने रख रख रहा हूँ। एक पत्रकार के रूप में सी.एम.देसाई की राजकपूर और शैलेंद्र से कई मुलाकातें और बातें हुईं थीं। आइए उन्हीं की ज़बान से यह क़िस्सा सुनें-


राजकपूर उस समय माटुंगा में अपने पिता पृथ्वीराजकपूर के साथ रहते थे। वर्ष 1948 में सिर्फ 24 साल की उम्र में वे आग फिल्म का निर्देशन कर चुके थे और बरसात की तैयारी कर रहे थे । उसी समय वे संयोगवश रेलवे के माटुंगा वर्कशाप में बतौर अतिथि पधारे ।


महाराष्ट्र में सत्यनारायण की पूजा का विशेष महत्व है। प्रतिवर्ष सरकारी कार्यालयों में भी बडे शानदार ढंग से सत्यनारायण की महापूजा की जाती है। उस साल माटुंगा के रेलवे वर्कशाप में सत्यनारायण की पूजा में मुख्य अतिथि के रुप में प्रतिष्ठित अभिनेता पृथ्वीराजकपूर को आमंत्रित किया गया था। वे अपने बेटे राजकपूर को भी साथ लाए। पूजा के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत शैलेंद्र का कवितापाठ था। उस समय शैलेंद्र परेल के रेलवे वर्कशाप में एक तकनीकी कर्मचारी थे और मज़दूर यूनियन में भी सक्रिय थे। उनका पूरा नाम था शंकर दास शैलेंद्र और वे एक जोशीले कवि के रुप में अपने मज़दूर साथियों के बीच बहुत लोकप्रिय थे।


फ़िलहाल माटुंगा के कार्यक्रम में पृथ्वीराजकपूर की उपस्थिति में शैलेंद्र ने अपने कवितापाठ से रंग जमा दिया। कार्यक्रम के बाद राजकपूर उन्हें एक किनारे ले गए और पूछा- मेरी फिल्म में गीत लिखोगे।’ शैलेंद्र ने साफ-साफ मना कर दिया। बोले- मैं अपनी नौकरी से बहुत खुश हूँ। राजकपूर ने उन्हें अपना विजिटिंग कार्ड देते हुए कहा- कोई बात नहीं, तुम्हें कभी पैसों की जरुरत पड़े तो मेरे पास आ जाना। कुछ समय बाद शैलेंद्र की पत्नी बीमार पड़ गई। यार-दोस्तों से उधार लेकर भी इलाज का ख़र्च पूरा नहीं हुआ तो उन्हें राजकपूर की याद आई। शैलेंद्र ने पत्नी के इलाज के लिए राजकपूर से पैसे उधार लिए और कहा छ:माह के भीतर मैं यह उधार चुका दूँ।



जब शैलेंद्र को लगा कि वे उधार नहीं चुका पाएंगे तो वे राजकपूर के पास गए और कहा कि वे गीत लिखने के लिए तैयार हैं । उस समय तक बरसात के सारे गीत रिकार्ड हो चुके थे। गीतकार थे हसरत जयपुरी। राजसाहब ने उन्हें समझाया- मैं इस नौजवान को मौका़ देना चाहता हूँ। इसलिए मुझे तुम्हारे दो गीत हटाने पडेंगे। ये गीत थे प्रेम नगर में बसने वाले और मैं जिंदगी में हरदम रोता ही रहूंगा। इन्हें हटाकर शैलेंद्र से दो गीत लिखवाए गए। दोनों गीत बेहद लोकप्रिय हुए। वे गीत हैं बरसात में हमसे मिले तुम सनम तुमसे मिले हम और पतली कमर है तिरछी नज़र है।


बरसात के -इस गीत को फ़िल्म जगत का पहला शीर्षक गीत माना जाता है। इसी फ़िल्म से राजकपूर ने पांच लोगों की टीम बनाई और आजीवन दोस्ती निभाई। ये हैं - शंकर-जयकिशन, शैलेंद्र, हसरत जयपुरी और मुकेश। शैलेंद्र के लिखे- जीना यहां मरना यहां, मेरा जूता है जापानी, होठों पे सचाई रहती है जैसे गीतों ने राजकपूर की शाख्सियत को गढ़ने में विशेष भूमिका अदा की। जब शैलेंद्र ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म तीसरी कसम बनाई तो नायक की भूमिका के लिए राजकपूर से अनुरोध किया। हालांकि उस समय राजकपूर की उम्र अधिक हो गई थी मगर उन्होंने दोस्ती निभाई। एक सीधे-साधे प्रौढ़ प्रेमी के रुप में उन्होंने फिल्म को यादगार बना दिया। शैलेंद्र के सादगी भरे शब्दों ने राजकपूर के सीधे सादे व्याक्तित्व के साथ मिलकर दर्शकों पर अमिट छाप छोडी- सजन ने झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है ।


यह भी अजब संयोग है कि राजकपूर की जन्म तिथि 14 दिसम्बर है और शैलेंद्र की पुण्यतिथि 14 दिसम्बर है। 30 अगस्त को गीतकार शैलेंद्र का जन्मदिन था। क्या आपने उन्हें याद किया !

4 comments:

honesty project democracy said...

निश्चय ही शैलेन्द्र जैसे महान इंसान को याद नहीं करना एक बड़ी भूल है जिसके लिए मुझे अफ़सोस है ,ऐसे गीतकार और इंसान की आज भी इस देश और समाज को बहुत जरूरत है ,आपका बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने ऐसे इंसान को सम्मान देते हुए पोस्ट लिखा ...शानदार पोस्ट ...

नीरज गोस्वामी said...

शैलेन्द्र जी को याद करने का शुक्रिया...राजकुमार केसवानी जी ने भी उनपर बहुत खूबसूरत लेख लिखा है...दुर्लभ जानकारी देने के लिए आपका शुक्रिया...

नीरज

नीलम शर्मा अंशु said...

जी हाँ, बिलकुल याद किया।

30 अगस्त को मैंने रेनबो पर एक घंटे और गोल्ड पर आधे घंटे का प्रोग्राम लाईव पेश किया थ। श्रोताओं ने इसके लिए धन्यवाद भी दिया। आज उनको गुज़रे 44 होने जा रहे हैं लेकिन उनके लिखे गीत आज भी
सुपरहिट हैं।

26 अगस्त को आकाशवाणी कोलकाता का जन्मदिवस था। मैंने खास तौर से 26 अगस्त और 30 अगस्त की duty मांग कर ली थी। मुझे ऐसे विशेष प्रोग्राम करना अच्छा लगता है।

जब भी डयुटी अलॉट होती है मैं सबसे पहले तो यही देखती हूँ कि उस दिन विशेष क्या है। किसका जन्मदिन या पुण्यतिथि है।

नीलम शर्मा अंशु said...

शैलेन्द्र राजकपूर से किए अपने वादे को पूरा नहीं कर पाए कि मेरा नाम जोकर के गीत जीना यहां मरना यहां को वे जल्दी ही पूरा कर देंगे। बाद में यह गीत उनके सुपुत्र शैलेन्द्र शैली ने लिखा

कैसी विडंबना है कि जिस फिल्म के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व लगा दिया और जिसका सदमा उनकी मु़त्यु का कारण बना, वह फिल्म बाद में लोकप्रिय और हिट तो हुई लेकिन उसकी लोकप्रियता देखने के लिए वे इस दुनिया में ही नहीं रहे।