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Sunday, August 22, 2010

देवमणि पाण्डेय के पाँच गीत


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[1]

सफ़र पे जो निकलते हैं किसे मुश्किल नहीं मिलती
मगर जो हार जाते हैं उन्हें मंज़िल नहीं मिलती
कहीं कुछ रोशनी है
यही तो ज़िंदगी है

चले जब वक़्त की आँधी घरौंदे टूट जाते हैं
जो रिश्ते हैं बहुत नाज़ुक वो पीछे छूट जाते हैं
निगाहों में नमी है
यही तो ज़िंदगी है

हो सहरा दूर तक लेकिन रहे कुछ आस तो बाक़ी
बरसते अश्क हों फिर भी रहे कुछ प्यास तो बाक़ी
दिलों में तिश्नगी है
यही तो ज़िंदगी है

सुहाने ख़्वाब तो अक्सर सभी पलकों पे खिलते हैं
जो चाहा था वही मंज़र कहाँ आखों को मिलतते हैं
कहीं कोई कमी है
यही तो ज़िंदगी है

[2]
ज़िंदगी के नाम पर क्या कुछ नहीं तूने दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

क्या ख़बर तुझको कि हमने गाँव छोड़ा किस लिए
झूमती गाती हवा फ़सलों को छोड़ा किस लिए
मिल गया हमको ठिकाना पर कभी भूले नहीं
अपने घर आँगन से रिश्ता हमने तोड़ा किस लिए

आज भी रोशन है दिल में गाँव जैसे इक दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

खो गये फूलों के मौसम खो गईं फुलवारियां
खो गये ढोलक मंजीरे खो गईं पिचकारियां
अब कहाँ तुलसी का चौरा और वो पीपल की छाँव
खो गए दादी के क़िस्से खो गईं किलकारियां

लेके होठों से हँसी अश्कों का तोहफ़ा दे दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

अजनबी चेहरों का हर पल एक रेला है यहां
हर जगह हर वक़्त जैसे एक मेला है यहां
हर क़दम पर बेकसी लाचारगी ढोता हुआ
भीड़ में भी आदमी बेहद अकेला है यहां

छीनकर गंगा का जल खारा समंदर दे दिया
शुक्रिया मेरे शहर सौ बार तेरा शुक्रिया

[3]
पत्थर हों जिनके सीने में
क्या उनसे मोहब्बत करना
सपनों के शहर में मुश्किल है
सपनों की हिफ़ाज़त करना

इस शहर की तपती सड़कों पर
कोमल तलुवे जल जाते हैं
फूलों से नाज़ुक चहरे भी
दिल को घायल कर जाते हैं

काँटों से भरे इस गुलशन में
ख़ुशबू की चाहत करना

आखों की चमक ही रूठ गई
हसरत न कोई मंसूबा है
किसी और से कुछ मतलब ही नहीं
हर चेहरा ख़ुद में डूबा है

ऐसे लोगों से ठीक नहीं
इज़हारे-शराफ़त करना

मुस्कान लबों से ग़ायब है
हर शख़्स भीड़ का हिस्सा है
इस मायानगरी में सबका
इतना ही फ़साना, क़िस्सा है

इंसान यहाँ भूला हँसना
भूला है शरारत करना

[4]

इस दुनिया का रंग देखके सबने बदली चाल मियां
तुमसे कुछ भी छिपा नहीं है क्या बतलाएं हाल मिया

देखके टीवी पर विज्ञापन
रुठ गई बिटिया बबली
चेहरा अपना चमकाने को
मांगे फेयर एन लवली
नया दौर मां - बाप की ख़ातिर है जी का जंजाल मियां

फर्स्ट क्लास ग्रेजुएट है राजू
मगर नौकरी नहीं मिली
मजबूरी में पेट की ख़ातिर
बेच रहा है मूंगफली
कमोबेश सब पढ़े लिखों का इक जैसा अहवाल मियां

जिसमें झांको उसी आंख में
तैर रहा दुख का बादल
फिर भी यूँ हँसते हैं नेता
जैसे हँसते हैं पागल
ऊपर से ये ख़ुश लगते हैं अंदर हैं बेहाल मियां

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[5]
आकाश में दिन भर चलकर जब
घर लौटके सूरज आया है
तब शाम ने अपने आँचल में
हौले से उसे छुपाया है
सुरमई शाम की पलकों पर
कितने ही ख़्वाब मचलते हैं
यह देख रही किसका रस्ता
चाहत के दीपक जलते हैं
यह रात खिलेगी जब चंदा
जादू बनकर छा जाएगा
उस वक़्त कोई प्यारा सपना
इन आँखों को महकाएगा
उम्मीद की कल इक नई सुबह
धीमे से पलकें खोलेगी
ख़ुशियों से चेहरे चमकेंगे
जब साल मुबारक बोलेगी


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3 comments:

Prem Farrukhabadi said...

इस दुनिया का रंग देखके सबने बदली चाल मियां
तुमसे कुछ भी छिपा नहीं है क्या बतलाएं हाल मिया

bahut hi sundar bhav.

सुनील गज्जाणी said...

सम्मानिय देव साब !
प्रणाम !
आप कि पांचो रचनाये अच्छी लगी ,
साधुवाद !
सादर !

Poorviya said...

Pandeyji,
Kiya yaad dilai hai naya nau din purana saudin----