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Monday, January 11, 2010

पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र

क़रीब दस साल पहले भोपाल के वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने मुम्बई की एक दोस्ताना महफ़िल में ताज भोपाली के ये शेर सुनाए थे –

पीछे बँधे हैं हाथ मगर शर्त है सफ़र
किससे कहें कि पाँव के काँटे निकाल दे
मैं ताज हूँ तू अपने सर पे सजाके देख
या मुझको यूँ गिरा के ज़माना मिसाल दे


मोहम्मद अली ताज उर्फ़ ताज भोपाली किसी ज़माने में भोपाल के मशहूर होटल ‘अहद’ के मालिक थे । वे दिन में अपने होटल से जो कमाते थे शाम को उसे मयख़ाने में उड़ाते थे ।उनके चारों तरफ़ नौजवानों का हुजूम होता था । गपशप के दौरान वे अचानक कोई शेर कह डालते थे । कहने के बद भूल जाते थे । कोई नौजवान नोट करके दूसरे दिन उनका शेर उन्हें सुनाता तो बड़ी हैरत से पूछते-‘’क्या सचमुच इतना बढ़िया शेर मैने कहा है ?’’ कवि राजेश जोशी ने भी कई बार उनके शेर नोट किए थे । बहरहाल उनकी शराबनोशी ने उनका होटल बंद करवा दिया तो मजरूह सुलतानपुरी की सलाह पर वे फ़िल्मों में गीत लिखकर पैसा कमाने के लिए वे मुम्बई आ गए । मालाड में एक फ़िल्म निर्माता एस.एम.सागर के यहाँ उन्हें सर छुपाने को छत मिल गई। यहां शायर ज़फ़र गोरखपुरी ने उन्हें मेहमानों के कप-गिलास उठाते देखा बड़े दुखी हुए । फिर वे ताज साहब को अपने साथ कई मुशायरों में ले गए । मुशायरों में उन्हें काफी पसंद किया जाता था । मगर फ़िल्म नगरी को वे और फ़िल्म नगरी उन्हें रास नहीं आई तो भोपाल वापस लौट गए । ज़फ़र साहब का कहना है कि वे किसी दरवेश की तरह बड़े अच्छे इंसान और उम्दा शायर थे । एक मित्र ने बताया कि हिंदी ग़ज़ल के शिखर दुष्यंत कुमार उनसे बहुत प्रभावित थे ।वे अपनी ग़ज़लें दिखाने के लिए ताज साहब के पास गए भी थे । ताज साहब ने उन्हें सलाह दी कि उनकी ग़ज़लों का तेवर इतना अलग और मौलिक है कि उसे किसी इस्लाह की ज़रूरत ही नहीं है। यही तेवर एक दिन उन्हें अलग पहचान दिलाएगा । और हुआ भी वही ।

6 comments:

anitakumar said...

ताज साहब से मिलवाने के लिए शुक्रिया। उनके कुछ और शेर यहां परोसते तो और अच्छा लगता

devmanipandey said...

हौसला बढ़ाने के लिए आप सबका शुक्रिया !

sumita said...

ताज भोपाली जी का नाम तो काफ़ी सुना पर उनके बारे में नई जानकारी मिली अच्छा लगा।

नीरज गोस्वामी said...

ऐसे नायाब शख्श से मिलवाने का बहुत बहुत शुक्रिया...
नीरज

Ulhas said...

Kabhi sapne chur-chur ho jate hai,
halaat se DOST bhi dur-2 ho jate hai.
par apki yadein itne state hai
ki SMS karne par mjbur ho jate hai.

Ulhas said...

Likhte hai hum kisi aur k liye,
Mere dard ko tum apna mat samjhna.
Haqiqat me hum unhe chahte hai bepanah,
Ise tum mera sapna mat samjhna.